-अजय बोकिल
बिहार में विधानसभा चुनाव की घोषणा के पहले तक ‘वोट चोरी’ ( एसआईआर, यानी स्पेशल इंटेंसिव रिवीजन) का जो मुद्दा जोर शोर से उठा और चुनाव प्रचार के दौरान लगभग गायब रहा, उसी ‘वोट चोरी’ के मुद्दे में चुनाव के अधबीच राहुल गांधी ने फिर से जान फूंकने की कोशिश की है। लेकिन दिक्कत यह है कि यह मुद्दा विपक्षी राजनीतिक दलों को तो परेशान किए हुए है, लेकिन उस जनता से अपेक्षानुरूप जुड़ नहीं पा रहा है, जिसे वोट करना है। ‘वोट चोरी’ की बात उठाने से विपक्षी पार्टियों को वोट मिलेंगे ही, इसकी कोई गारंटी नहीं है। हाल में चुनाव आयोग द्वारा विपक्षी दलों के विरोध को दरकिनार करते हुए 12 राज्यों और 3 केन्द्र शासित प्रदेशों में एसआईआर 2.0 की प्रक्रिया शुरू कर दी गई है। पश्चिम बंगाल में एसआईआर की खबर मिलते ही कुछ बांगलादेशी विस्थापितों ने आत्महत्याएं शुरू कर दी हैं तो तमिलनाडु और केरल की सरकारें इसके खिलाफ सुप्रीम कोर्ट जाने की तैयारी में हैं। हालांकि यह मामला सुप्रीम में पहले ही लंबित है। ऐसे में दोबारा उसे लगाने का क्या मतलब है? और अभी तक सुप्रीम कोर्ट ने एसआईआर पर रोक नहीं लगाई है। तो क्या ये सिर्फ उन राज्य सरकारों का चुनावी ‘वार्म अप’ है, जहां अगले साल विधानसभा चुनाव होने हैं? जिस तरह यह मुद्दा बिहार में पहले दौर के चुनाव प्रचार में गायब रहा उससे लगता है कि यह मुद्दा तकनीकी और नैतिक ज्यादा है? अब सवाल ये कि अगर ‘वोट चोरी’ के मुद्दे पर वोट पाने की गारंटी नहीं है तो इसे उठाते रहने का व्यावहारिक औचित्य क्या है? क्या केवल चुनाव आयोग को कठघरे में खड़ाकर चुनाव प्रक्रिया को संदिग्ध बनाना, एनडीए सरकारों की नीयत पर उंगली उठाना या फिर एक बुनियादी सवाल को लेकर लोकतांत्रिक लड़ाई लड़ते रहना है?
चुनाव आयोग मप्र सहित एक दर्जन राज्यों में जो एसआईआर करा रहा है, उसका राजनीतिक नामकरण राहुल गांधी ने ‘वोट चोरी’ किया हुआ है। इस मुद्दे पर चुनाव आयोग और मोदी सरकार को घेरने के अपने अभियान के दूसरे चरण में ‘हाइड्रोजन बम’ फोड़ते हुए राहुल गांधी ने हरियाणा में पिछले साल हुए विधानसभा चुनाव में 25 लाख वोटों की चोरी का आरोप मय सबूतों के लगाया। उन्होंने यह भी कहा कि ब्राजील की एक मॉडल ( अब पूर्व) की फोटो 22 अलग-अलग नामों पर लगी मिली। उन्होंने कहा कि जैसे हरियाणा में वोट चोरी कर भाजपा ने बिहार में सरकार बनाई, वैसा ही खेल बिहार में भी होने जा रहा है। जबकि हरियाणा के सभी चुनाव पूर्व सर्वेक्षणों में हम ही जीत रहे थे। हालांकि उन्होंने यह नहीं बताया कि पिछले साल लोकसभा चुनाव पूर्व सर्वेक्षणों में ज्यादातर पोल एनडीए को चार सौ पार बता रहे थे, लेकिन नतीजा क्या आया? वहां किसके वोट किसने चुराए? बहरहाल राहुल गांधी के इस संगीन आरोप पर चुनाव आयोग स्थितप्रज्ञ ही रहा। जबकि भाजपा ने राहुल के दावों को खारिज करते हुए कहा कि यह बिहार में संभावित हार के मद्देनजर तैयार की जा रही पूर्वपीठिका है।
यहां दो बातें हैं। चुनाव के पहले एसआईआर का तगड़ा विरोध और चुनाव के समय इस मुद्दे का हाशिए पर जाना तथा चुनाव नतीजों के बाद फिर अपनी शय्या से जाग उठना। दरअसल अब चुनाव में धार्मिक व जातीय गोलबंदी, रेवडिय़ों की बौछार और माइक्रो लेवल के वोट मैनेजमेंट की गलाकाट होड़ के बीच जीत की वैधता को चुनौती देने का नया हथियार है एसआईआर। क्योंकि अगर इस मुद्दे पर वोटरों को गोलबंद किया जा सकता तो बिहार में चुनाव प्रचार के दौरान इसे हाशिए पर क्यों डाल दिया गया? और अब फिर उसमें जान क्यों फूंकी जा रही है? विपक्षी दल इसको लेकर इतने संवेदनशील और डरे हुए क्यों हैं? और चुनाव आयोग और भाजपा इस विरोध की परवाह क्यों नहीं कर रहे हैं? जहां तक बिहार का सवाल है तो वहां विधानसभा चुनाव के नतीजे वोट चोरी मुद्दे का राजनीतिक भविष्य भी तय करेंगे, इसमें शक नहीं। फिर चाहे एनडीए जीते अथवा महागठबंधन।
वास्तव में विपक्षी दलों को संदेह चुनाव आयोग की नीयत पर है। उनका मानना है कि वोटर लिस्ट में हेराफेरी कर चुनाव आयोग परोक्ष रूप से भाजपा और एनडीए को जीतते जाने में मदद कर रहा है। ऐसा ही चला तो उनके हाथों से सत्ता छिननी तय है। इसीलिए तमिलनाडु में सत्ताधारी डीएमके और उसके सहयोगियों ने एसआईआर को ‘लोकतंत्र को कमजोर करने की केंद्रीय साजिश’ करार देते हुए इसके खिलाफ सुप्रीम कोर्ट जाने की बात कही है। कहा गया कि तमिलनाडु में बिहार दोहराने नहीं दिया जाएगा, जहां एसआईआर के बाद 65 लाख वोटरों के नाम कटे हैं। स्टालिन सरकार की तर्ज पर ऐसा ही कदम केरल की वामपंथी सरकार भी उठा रही है।
पश्चिम बंगाल में सत्ताधारी तृणमूल कांग्रेस (टीएमसी) ने तो एसआईआर को ‘बिहार का ड्रेस रिहर्सल’ बताते हुए भाजपा पर निशाना साधा। पार्टी के वरिष्ठ नेता डेरिक ओब्रायन ने कहा कि एसआईआर का असली निशाना बंगाल है। जबकि भाजपा नेता प्रतिपक्ष सुवेंदु अधिकारी ने कहा कि एसआईआर से टीएमसी का फर्जी वोट बैंक साफ हो जाएगा। जाहिर है कि इन राज्यों में विधानसभा चुनाव होने तक राजनीतिक मिसाइलें चलती रहेंगी। लेकिन ‘एसआईआर’ और ‘वोट चोरी’ में एक गुणात्मक अंतर है। एसआईआर एक संवैधानिक प्रक्रिया है, जिसे राज्य तमाम विरोध और अड़ंगों के बाद भी नहीं रोक सकेंगे। जबकि ‘वोट चोरी’ एक शंकाजन्य राजनीतिक जुमला है, जो दोहराया जाता रहेगा। इसका अर्थ यह नहीं कि मतदाता सूची पुनरीक्षण में कहीं कोई गड़बडिय़ां हुई ही नहीं हैं। कई सवाल अभी बाकी हैं, जिनके चु्नाव आयोग ने संतोषप्रद जवाब नहीं दिए हैं। चुनावी माहौल बनाने की दृष्टि से ‘वोट चोरी’ अहम मुद्दा है। लेकिन क्या यह मुद्दा राजनीतिक पार्टियों के साथ-साथ आम मतदाता के लिए भी उतना ही मायने रखता है या नहीं, यह तो बिहार विधानसभा चुनाव नतीजों से तय होगा। क्योंकि वहां जिन मुद्दों में चुनावी बारूद देखा जा रहा है, उसमें ‘वोट चोरी’ गायब था। हकीकत में मतदाता की रूचि कौन क्या ‘फ्री’ में दे रहा है, इसमें ज्यादा है बनिस्बत इसके कि किसका नाम वोटर लिस्ट से कटा है। जैसे कि दुनिया उन्हीं की होती है, जो इसमें रहते हैं, वही हाल एसआईआर का है, जिनके नाम कट ही गए तो अब क्या। जो वोट देने की स्थिति मे हैं, उन्हें रिझाने के ही राजनीतिक मायने हैं।
बिहार विस चुनाव में भी अगर तेजस्वी यादव के नेतृत्व में महागठबंधन चुनाव जीत जाता है तो ‘वोट चोरी’ की बात सियासी लफ्फाजी ज्यादा थी, यह स्वत: साबित हो जाएगा। लेकिन अगर नीतीश के नेतृत्व में एनडीए सत्ता में लौटा तो भी संदेश यही जाएगा कि विपक्ष के पास चूंकि कोई और मुद्दा नहीं था, इसलिए ‘वोट चोरी’ को आड़ बनाया गया, जिसे जनता ने ही खारिज कर दिया। इस पूरे मामले में चुनाव आयोग के लिए संदेश यह है कि वह चुनाव प्रक्रिया को हर स्तर पर इतना पारदर्शी बनाए और वैसी दिखे भी कि किसी को इस पर उंगली उठाने का मौका न मिले। किसी की आंख के इशारे का इंतजार किए बगैर अपनी पवित्रता और निष्पक्षता उसे खुद ही सिद्ध करनी होगी। वरना उसका ज्यादतर समय काम करने की जगह आरोपों पर सफाइयां देने में ही गुजरेगा। वैसे यह भी विचारणीय है कि जिन राज्यों में गैर भाजपा सरकारें हैं, वहां चुनाव आयोग ‘वोट चोरी’ कैसे कर पाएगा? (ममता बैनर्जी ने तो अभी से पूरी सरकारी मशीनरी बदल डाली है) अगर वहां भी ‘सेंध’ लगती है तो इसे किसकी अक्षमता माना जाएगा? इसके अलावा चुनावी हार के असली कारण कुछ और होते हैं, बजाए ‘वोट चोरी’ के। उनका निदान समय रहते नहीं किया गया तो हार का ठीकरा फोड़ऩे के लिए नए सिर तलाशने ही पड़ते हैं।
(लेखक-वरिष्ठ पत्रकार हैं)

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