साजा/कवर्धा.
छत्तीसगढ़ के चुनाव क्या पहली बार सांप्रदायिक होने जा रहे हैं, क्या दो विधानसभा सीटों में हुईं सांप्रदायिक घटनाएं पूरे राज्य के माहौल को प्रभावित करने जा रही हैं? यह सवाल इसलिए उठ रहे है क्योंकि यह पहली बार है जब यहां के चुनावों में हिंदू-मुस्लिम और ध्रुवीकरण जैसी बातें हुई हैं। राज्य की दो विधानसभाओं साजा और कवर्धा के चुनावों में सांप्रदायिक रंग साफ देखा गया। कवर्धा में 7 नवंबर को वोट पड़ चुके हैं और साजा में 17 नवंबर को वोट पड़ने बाकी हैं।
यह सवाल छत्तीसगढ़ की राजनीतिक फिजाओं में तैर रहा है कि क्या इन दो सीटों के अलावा राज्य की बाकी सीटों पर भी इस मुद्दे का प्रभाव होगा। क्या 'सौ अकबर आएंगे' नारा काम करेगा? या फिर जनता हमेशा की तरह अपने पुराने मुद्दों पर ही वोट करती दिखेगी। राजनीतिक विश्लेषक मानते हैं कि यह पहली मर्तबा है जब राज्य में किसी भी सीट पर हिंदू-मुस्लिम करके वोट मांगे गए हैं। क्योंकि राज्य में मुस्लिमों की संख्या बहुत कम है इसलिए कभी इस पैटर्न पर चुनाव लड़े ही नहीं गए। टिकट वितरण में भी धर्म का आधार नहीं लिया गया। राज्य की पूरी आबादी में एक प्रतिशत की भी दखल ना रखने वाले मुसलमान क्या इस बार चुनावी राजनीति में मुद्दा बन गए हैं? इस बार क्या कुछ बदला है और उन सीटों पर समीकरण कैसे हैं, आइए इसकी पड़ताल करते हैं।

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