February 26, 2026

ट्रंप का टेरिफ प्लान, अमेरिका के बिगडऩे लगे सहयोगी देशों से संबंध

नई दिल्ली। अमेरिका द्वारा हाल के दिनों में लागू किए गए टेरिफ प्लान ने वैश्विक स्तर पर अमेरिका के लिये नई आर्थिक चुनौतियों को जन्म दिया है। राष्ट्रपति ट्रंप का तर्क है कि यह कदम घरेलू उद्योगों की सुरक्षा और रोजगार को बचाने के लिए उठाया गया है। लेकिन इसके असर अंतरराष्ट्रीय व्यापार संबंधों पर स्पष्ट रूप से दिखाई देने लगे हैं। अमेरिका के करीबी सहयोगी देश, जो दशकों से अमेरिका के साथ मजबूत साझेदारी का हिस्सा रहे हैं। अब इस नीति को लेकर असहज हो गए हैं।

यूरोपीय संघ, जापान, कनाडा और दक्षिण कोरिया जैसे देशों ने अमरीकी टेरिफ निर्णयों पर चिंता जताई है। उनका कहना है, अमेरिका की यह नीति मुक्त व्यापार की भावना के विपरीत है। इससे वैश्विक सप्लाई चेन बाधित हो सकती है। कई देशों ने स्पष्ट संकेत दिए हैं, अगर वाशिंगटन ने अपने टेरिफ प्लान में नरमी नहीं दिखाई तो वह भी जवाबी कार्रवाई करने को मजबूर होंगे। इससे द्विपक्षीय संबंधों में तनाव बढऩे की आशंका गहराती जा रही है।

कनाडा और यूरोप ने पहले ही कुछ अमेरिकी उत्पादों पर अतिरिक्त शुल्क लगाने की तैयारी कर ली है। वहीं एशियाई सहयोगी देश भी ट्रंप की नीति से असंतुष्ट हैं। वह वैकल्पिक व्यापार साझेदार खोजने में लगे हैं। विशेषज्ञों का मानना है कि अमेरिका की इस सख्त व्यापार नीति से न केवल उसके सहयोगी देशों का भरोसा कम होगा, बल्कि दीर्घकालिक रणनीतिक रिश्तों पर भी नकारात्मक असर पड़ेगा। रक्षा और सुरक्षा जैसे अहम मुद्दों पर भी इसका प्रभाव पड़ सकता है, क्योंकि आर्थिक असहमति अक्सर राजनीतिक रिश्तों को कमजोर कर देती है।

अमेरिका ने स्टील, एल्युमिनियम, टेक्नोलॉजी और अन्य क्षेत्रों में आयात पर टेरिफ बढ़ाए हैं, जिसके कारण व्यापार लागत बढ़ गई है। इससे अमेरिकी सहयोगी देशों की कंपनियां परेशान हैं, क्योंकि उनके उत्पाद अमेरिका के बाजार में प्रतिस्पर्धी नहीं रह पा रहे। कई उद्योग संगठन भी इस कदम का विरोध कर चुके हैं और चेतावनी दी है कि इससे वैश्विक आर्थिक अस्थिरता बढ़ सकती है। कुल मिलाकर, अमेरिका की टेरिफ नीति ने उसके पुराने सहयोगियों के बीच अविश्वास का माहौल पैदा कर दिया है। बदलते वैश्विक परिदृश्य में यदि अमेरिका ने संतुलित रुख नहीं अपनाया तो आने वाले समय में उसे न केवल आर्थिक बल्कि कूटनीतिक स्तर पर भी अलगाव का सामना करना पड़ सकता है। यह स्थिति दर्शाती है कि आर्थिक नीतियां अब केवल व्यापार तक सीमित नहीं रहीं, बल्कि वैश्विक साझेदारियों और रणनीतिक रिश्तों को भी प्रभावित कर रही हैं।