उज्जैन.
श्रावण-भाद्रपद मास के प्रथम सोमवार को जब अवंतिकानाथ भगवान महाकाल रजत पालकी में विराजमान होकर अपनी प्रजा का हाल जानने नगर भ्रमण पर निकलेंगे, तब केवल उज्जैन ही नहीं, मानो समूचा भूमंडल उनके दर्शन की प्यास लिए सवारी मार्ग पर उमड़ पड़ेगा। उस क्षण तीर्थनगरी अवंतिका कमल-दल की भांति खिल उठती है।
संकरी गलियां लाखों श्रद्धालुओं को अपने आंचल में समेट लेती हैं, "हर-हर महादेव" का गगनभेदी जयघोष वातावरण को शिवमय बना देता है और नगर का कण-कण आस्था से स्पंदित हो उठता है। किन्तु इस अलौकिक वैभव के पीछे कुछ ऐसे अनाम साधक भी हैं, जो वर्षों से निस्वार्थ भाव से महाकाल की सेवा में रमे हैं। कोई रंगों से सवारी मार्ग को भक्ति का कैनवास बना देता है, कोई पुष्पों से पालकी का दिव्य श्रृंगार करता है, कोई पीढ़ियों से चली आ रही परंपरा निभाते हुए पालकी को अपने कंधों पर उठाता है, तो कोई झांझ-डमरू की मंगल ध्वनि से पूरी सवारी में शिवरस घोल देता है। इन्हीं मौन सेवकों की समर्पित साधना महाकाल की सवारी को केवल भव्य नहीं, बल्कि दिव्य और अविस्मरणीय बना देती है।
महाकाल भरते हैं कल्पना में रंग…मैं तो सिर्फ रंगोली बनाता हूं
यह कहना है अब्दालपुरा निवासी रंगाेली कलाकार व रंगकर्मी कुंजबिहारी पंड्या का, जो बीते 20 सालों से सवारी मार्ग को रंगोली से सजाते आ रहे हैं। इस वर्ष भी उन्होंने राजा की राह सजाने के लिए महाराष्ट्र और गुजरात से विशेष रंग मंगवाए हैं। उनका कहना है, "मेरी कल्पना में रंग तो महाकाल भरते हैं, मैं तो सिर्फ उन्हें धरातल पर उतारता हूं। सवारी मार्ग पर बनने वाली हर आकृति बाबा की प्रेरणा से स्वस्फूर्त तरीके से बनती जाती है, भक्ति के यह रंग लाखों श्रद्धालुओ का मनमोह लेते हैं और प्रशंसा का पात्र में बनता हूं, यही तो कृपा है मेरे महादेव की।
अजय भावना के फूलों से सजाते हैं पालकी
मालीपुरा निवासी पुष्प सज्जाकार अजय परमार पिछले 15 वर्षों से महाकाल की पालकी का पुष्प श्रृंगार कर रहे हैं। गुलाब, गेंदा, रजनीगंधा के साथ ऑर्किड, एंथुरियम, जरबेरा और लिलियम जैसे विदेशी फूलों से पालकी को दिव्य स्वरूप दिया जाता है। अजय कहते हैं, मैं फूल नहीं चुनता, हर फूल को एक भावना मानकर बाबा के चरणों में अर्पित करता हूं। प्रत्येक सवारी में देश विदेश के फूलों की नस्ल वही रहती है, लेकिन रंगों का संयोजन अलग रहता है। इससे हरबार पालकी की पारंपरिक सजावट भी नई लगती है। इस बार भी बाबा की पालकी सजाने के लिए मुंबई से विशेष फूल मंगवाए गए हैं।
पांच पीढ़ी के अनुभव व अनुशासन से चलती है पालकी
भगवान महाकाल की सवारी में बाबा महाकाल की पालकी कहारों के कंधे पर दिखती अवश्य है, लेकिन यह चलती उनके पूर्वजों की पांच पीढ़ी के अनुभव, अनुशासन व मैकेनिज्म से है। यह कहना है कहार प्रशांत चंदेरी का, वे बताते हैं लाखों भक्तों की भीड़ में पालकी को चलायमान रखना, बैलेंस बनाना, रोकना देखने में सहज लगता है, लेकिन यह पूरा विज्ञान है। प्रत्येक सवारी में 90 कहार रहते हैं, एक बार में 20 कहार पालकी चलाते हैं। इनमें 10 कहार पालकी उठाते हैं। चार कहार दो-दो की संख्या में पालकी के दाएं और बाएं चलते हैं, हमारी भाषा में इसे पाए पर चलना कहते हैं, यह पालकी का बैलेंस बनाते हैं इससे पालकी पलटती नहीं है। दो कहार पालकी आगे चलते हैं,इनकी जिम्मेदारी पालकी को मार्ग के मध्य में चलाने की रहती है। शेष चार कहार पालकी के पीछे चलते हैं, तीन क्विंटल वजनी पालकी को अपने कंधों पर उठाए कहार जब तेज गति से आगे बढ़ते हैं और अचानक रुकते हैं तो सारा भार पीछे की ओर आ जाता है, तब पीछे चल रहे यही कहार सारा भार संभालते हैं।
शिवनाद से झूम उठते हैं धरती और अंबर
महाकाल की सवारी में जब डमरू की डिम-डिम और झांझ की गूंज एक साथ उठती है, तो वह केवल संगीत नहीं, बल्कि स्वयं शिव के नाद का साक्षात अनुभव बन जाती है। भस्म रमैया भक्त मंडल बीते 30 सालों से सवारी मार्ग पर भक्ताें को इसकी दिव्य अनुभूति कराते आ रहा है। संस्थापक प्रवीण मादुस्कर के निर्देशन में 25 से अधिक वादक झांझ और डमरू की मंगल लय से ऐसा आध्यात्मिक वातावरण रचते हैं कि श्रद्धालुओं के कदम स्वतः थिरक उठते हैं। हर ताल में शिवभक्ति का उत्साह, हर स्वर में महाकाल का स्मरण और हर उद्घोष में आस्था का ज्वार दिखाई देता है। उस पल ऐसा प्रतीत होता है मानो केवल अवंतिका ही नहीं, धरती, अंबर और दसों दिशाएं भी "हर-हर महादेव" के महामंत्र के साथ शिवमय होकर झूम उठे हों।

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