लखनऊ। इलाहाबाद हाईकोर्ट ने अपहरण, जबरन शादी और नाबालिग पत्नी से शारीरिक संबंध बनाए जाने के मामले में सुनवाई करते हुए दोषी को बरी कर दिया। सुनवाई के दौरान अदालत का कहना था कि पीडि़ता की शादी 16 साल की उम्र में पर्सनल लॉ बोर्ड के तहत की गई है, जो कि अमान्य नहीं है।
घटना के वक्त कानून के तहत पति-पत्नी के बीच संबंध अपराध नहीं माना जा सकता था। आरोपी इस्लाम की याचिका पर सुनवाई करते हुए सिंगल बेंच के जस्टिस अनिल कुमार ने निचली अदालत के फैसले को रद्द कर दिया और इस्लाम को बरी कर दिया। याचिका की सुनवाई करते हुए कोर्ट ने साल 1973 के सुप्रीम कोर्ट के फैसले का हवाला देते हुए कहा कि ले जाने और साथ जाने देने में कानूनी अंतर होता है।
जस्टिस अनिल कुमार ने कहा कि ये अलग बात है कि अभियोजन पक्ष (लडक़ी के पिता) यह साबित करने में विफल रहा कि पीडि़ता को आरोपी बहका कर या जबरदस्ती ले गया था। इस आधार पर कोर्ट ने आरोपी को धारा 363 और धारा 366 के आरोपों से बरी कर दिया। वहीं जब बात रेप यानी कि धारा 376 की आई तो कोर्ट ने यह भी पाया कि पीडि़ता की आयु ऑसिफिकेश टेस्ट के मुताबिक 16 वर्ष से अधिक थी। मुस्लिम पर्सनल लॉ में 15 वर्ष की आयु को विवाह योग्य मानकर बालिग माना जाता है, इसलिए यह विवाह वैध है। हालांकि ट्रायल कोर्ट ने आरोपी इस्लाम को आईपीसी की धारा 363, 366 और 376 के तहत सात साल की कठोर कारावास की सजा सुनाई थी।
इसके अलावा हाईकोर्ट ने पीडि़ता के बयानों का विश्लेषण करते हुए पाया कि आरोपी इस्लाम के खिलाफ अपहरण का कोई केस नहीं बनता है। क्योंकि एक तरफ जहां लडक़ी के पिता ने यह आरोप लगाया था कि इस्लाम उनकी बेटी को बहला-फुसलाकर ले गया है। जबकि लडक़ी ने स्पष्ट रूप से कहा था कि वह अपनी मर्जी से इस्लाम के साथ गई थी। लडक़ी ने अपनी गवाही में यह भी बताया था कि उन दोनों ने कालपी में निकाह किया और फिर भोपाल में एक महीने तक दोनों पति-पत्नी की तरह रहे थे।

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