August 19, 2026

मित्रता की मिसाल डॉ. शंकर दयाल शर्मा और मेरे पिता

*19 अगस्त- जन्मदिन पर विशेष*

 

-प्रलय श्रीवास्तव

भोपाल की उपजाऊ भूमि ने एक से बढ़कर एक प्रतिभाशाली और स्वनामधन्य सपूत देश और समाज को दिये है। ऐसे ही एक होनहार और विद्वान सपूत थे डॉ. शंकर दयाल शर्मा। जी हाँ, भारत के राष्ट्रपति रहे डॉ. शंकर दयाल शर्मा का कृतित्व और व्यक्तित्व अनेक उपलब्धियों से परिपूर्ण रहा है। भोपाल के नव-निर्माण में उनके योगदान को सदैव याद किया जाता है और रहेगा। डॉ. शर्मा मेरे पिता मध्यप्रदेश के वरिष्ठ पत्रकार रहे स्व. श्री सत्यनारायण श्रीवास्तव के अभिन्न और पारिवारिक मित्र थे। उनकी मित्रता जीवन-पर्यन्त रही।

स्व. पिताजी के चंद उपलब्ध पत्रों व कागजातों से पता चलता है कि डॉ. शर्मा की साल 1954 में नागपुर के बूटीबोरी स्थित गाँव दुधाला में पिताजी की शादी में बराती बनकर भी गए थे। इस वाक्या का उल्लेख प्रसिद्ध शायर महरूम श्री शैरी भोपाली ने भी अपने संस्मरण में किया था, जब वे सत्यनारायण श्रीवास्तव स्मृति संध्या में पधारे थे, क्योंकि जनाब शैरी भोपाली भी बारात में शामिल रहे थे। पिताजी की शादी के बाद अक्सर डॉ. शर्मा और श्रीवास्तव दंपति साथ-साथ होते। यही कारण रहा कि मेरी पूज्य माताजी श्रीमती पुष्पा श्रीवास्तव और श्रीमती विमला शर्मा की भी घनिष्ठता रही। डॉ. शर्मा ने जब भोपाल संसदीय क्षेत्र से चुनाव लड़ा तो मेरी माँ और श्रीमती विमला शर्मा साथ मिलकर उनका प्रचार करती थी।

पिता स्व. श्री सत्यनारायण श्रीवास्तव भोपाल में 1950 से रह रहे थे। वर्ष 1952 में डॉ. शंकर दयाल शर्मा के भोपाल राज्य के मुख्यमंत्री बनने के बाद तो वे सुबह से देर शाम तक साथ हते। तब हम बच्चे और मां नरसिंहपुर में थे। पिताजी द्वारा 1970 में हम लोगों को राजधानी भोपाल शिफ्ट किया गया।पहले विधायक विश्राम गृह के खण्ड क्रमांक-3 के रूम नंबर 101-102 में कुछ माह रहे, फिर एफ 68/30 साउथ टी.टी. नगर में शिफ्ट हो गए। कुछ समय के बाद पिताजी ने प्रोफेसर कॉलोनी में शर्मा का पड़ौसी बनने में ज्यादा देर नहीं लगाई। अब हमारा नया पता डॉ. शंकर दयाल शर्मा का पड़ौस वाला घर ई-134/1 प्रोफेसर कॉलोनी हो गया था, जहां हम लोग पिताजी के 1981 में हुए आकस्मिक निधन के एक-दो वर्ष बाद तक रहे। पड़ौस में होने के कारण हम लोग-बच्चे डॉ. शर्मा के निवास पर होने वाली गतिविधियों को अक्सर देखा करते। डॉ. शर्मा जब भी चुनाव प्रचार पर निकलते तब हम बच्चों को अपने चुनाव निशान के बिल्ले और अन्य सामग्री जरूर देते।

आज इस बात से कौन इंकार कर सकता है कि राजधानी भोपाल का यह निखरा हुआ रूप डा. शंकर दयाल शर्मा की अनवरन साधना, धर्मनिरपेक्षता और उनकी अथक कार्यकुशलता ही परिणाम है। वर्ष 1952 में वर्ग सी स्टेट भोपाल राज्य में मुख्यमंत्री के रूप में सत्ता की बागडोर सम्हालने के बाद उन्होंने भोपाल राज्य को उत्तरोत्तर प्रगति के पथ पर ले जाने में अपनी ओर से कोई कसर शेष नहीं छोड़ी। उन्होंने भोपाल राज्य व बहुमुखी विकास के लिए जो भी योजनाएं केन्द्र सरकार के समक्ष प्रस्तुत की, उन्हें तुरंत स्वीकृति मिली। पॉलिटेकनिक कॉलेज की स्थापना से जो श्रृंखला प्रारंभ हुई वह गांधी मेडिकल कॉलेज, मौलाना आजाद इंजीनियरिंग कॉलेज (मेनिट) बीएचईएल, पीजीबीटी कॉलेज, रीजनल कॉलज से लेकर राज्य पुनर्गठन के फलस्वरूप नये मध्यप्रदेश में भोपाल राज्य के विलीनीकरण तक शामिल रही। डॉ. शर्मा के अथक प्रयासों के फलस्वरूप विशाल मध्यप्रदेश का गठन तथा राजधानी उसी भोपाल को चुना गया, जहां डा. शर्मा मुख्यमंत्री (भोपाल राज्य) थे।

मध्यप्रदेश के पुराने लोग जानते है कि मध्यप्रदेश के निर्माता पंडित रविशंकर शुक्ल और उनके दाहिने हाथ कहे जाने वाले पंडित द्वारकाप्रसाद मिश्र की कोशिश थी कि जबलपुर को मध्यप्रदेश की राजधानी बनाने में थी। मध्यप्रदेश के लोग बाबू तख्तमल के नेतृत्व में जुटे हुए थे ताकि इंदौर राजधानी बन जाए। उनकी तुलना में ‘ग’ श्रेणी के भोपाल राज्य कर्णधार के रूप में डॉ. शर्मा की सीमित शक्ति थी। नये मध्यप्रदेश की राजधानी क्या होगी, इसको लेकर दिल्ली के राज दरबार में गहमा-गहमी, उथल-पुथल मची रही। वह तो डॉ. शर्मा की अनवरत साधना, निर्भीकता और अपने उद्देश्य की पूर्ति में अंत तक जुटे रहने की कार्यक्षमता थी, जिसने भोपाल को मध्यप्रदेश की राजधानी होने का गौरव दिलाया। तब भोपाल की बेहत उत्सुक रही जनता ने रेडियो से भोपाल के संबंध में निर्णय को सुनकर घर-घर गिन्नियां बांटी थी। इस ऐतिहासिक निर्णय को लेकर जिस दिन डा. शंकर दयाल शर्मा भोपाल रेल्वे स्टेशन पर ट्रेन से उतरे, उस दौरान उनका जो अभूतपूर्व स्वागत हुआ, वह फिर देखने को नहीं मिला। डॉ. शर्मा ने ‘सी’ स्टेट के राज्य में भोपाल की जो झांकी सजाई और संवारी थी, वह अब राजधानी का रूप लेने जा रही थी।

आज का कोई भी भोपालवासी यह कह नहीं सकता कि यह वही सी स्टेट वाला भोपाल है, जहां के लोग रोशनपुरा नाका तक की सैर करने में शेर, तेंदुआ और लुटेरों के डर से जाने में अपनी खैर नहीं समझते थे।

भोपाल राज्य के समय जब मुख्यमंत्री डा. शंकर दयाल शर्मा थे, तब पिता स्वर्गीय श्री सत्यनारायण श्रीवास्तव जबलपुर व भोपाल से प्रकाशित होने वाले नवभारत में थे। उन दिनों डॉ शर्मा और पिता के अभिन्न साथी शायर शैरी भोपाली की माली हालत ठीक नहीं थी और जीवन-यापन मुश्किल से चल रहा था, ऐसे में पिताजी को एक तरकीब सूझी शायर शैरी भोपाली के इंतकाल का समाचार प्रकाशित करवाया। इसका परिणाम यह हुआ कि अपने दौरे के लिए रेलवे स्टेशन पहुँच चुके डॉ. शर्मा को यात्रा निरस्त कर सीधे शायर शैरी भोपाली के निवास पर पहुँचना पड़ा। समाचार उधर की जानकारी मिलते ही आग-बबूला हुए शायर शैरी भोपाली पिता को ढूंढने निकल पड़े। किसी ने भी अंदर की पूरी स्टोरी नहीं पढ़ी कि कैसे शायर शैरी भोपाली आर्थिक तंगी के दौर से गुजर रहे हैं। जब सारी बात समझी गई तब डॉ. शर्मा ने अल्प शिक्षित रहे शायर शैरी भोपाली की नौकरी नगर निगम में लगवाने की घोषणा की और वे सेवानिवृत्ति तक कार्यरत रहे। अपने दोस्त के प्रति ऐसी मित्रता और याराना आज के दौर में मिलना मुश्किल है।

एक किस्सा है इनकी मित्रता का साल 1973-74 की बात रही होगी, जब डॉ. शर्मा अखिल भारतीय कांग्रेस के अध्यक्ष और मध्यप्रदेश के मुख्यमंत्री श्री प्रकाश चंद्र सेठी थे। श्री सेठी से भी पिताजी की घनिष्ठता थी। दिल्ली से चर्चा चल पड़ी कि इंदिरा जी डॉ. शर्मा को मध्यप्रदेश के मुख्यमंत्री की कमान सौंपना चाहती हैं। ऐसे में चिंतित श्री सेठी ने पिता जी को चर्चा के लिए बुलाया जो यह जानते थे कि डॉ. शर्मा, श्रीवास्तवजी की किसी बात को इंकार नहीं कर सकते। चर्चा हुई और इस बात पर खत्म हुई कि दिल्ली जाकर डॉक्टर शर्मा से मध्य प्रदेश का मुख्यमंत्री बनने से इंकार करवाया जाए, इसके लिए पिताजी ने एक शर्त भी श्री सेठी के सामने रखी। जो पूरा होने बताने की बात कही गई। पिताजी के दिल्ली जाने के तीसरे दिन डॉ. शर्मा की ओर से बयान जारी होता है कि उन्हें मध्यप्रदेश का मुख्यमंत्री बनने में कोई दिलचस्पी नहीं है। उन्होंने अपनी भावना से हाईकमान को भी अवगत करा दिया है। तब श्री सेठी ने राहत की सांस ली। अब जब श्री सेठी और पिताजी की मुलाकात हुई तो उन्होंने अपनी शर्त याद दिलाई। श्री सेठी के पूछे जाने पर उन्होंने 30 हजार रूपये राशि की मांग रखी। जिसको बाद में समय-समय पर चुकाने का भरोसा दिलाया। यह पूछने पर कि इतनी बड़ी रकम का क्या करोगे, तो उत्तर था डॉ. शंकर दयाल शर्मा का वह नागरिक अभिनंदन जो भोपाल राज्य के मुख्यमंत्री बनने और मध्यप्रदेश की राजधानी भोपाल घोषित पर भी नहीं हो पाया था। अब कांग्रेस अध्यक्ष बनने पर होगा। भोपाल में होने वाले वृहद आयोजन तथा उस पर व्यय होने वाली राशि 30 हजार रूपये का सारा ब्यौरा भी श्री सेठी के सामने रख दिया गया। इसमें अभिनंदन ग्रंथ का प्रकाशन भी शामिल था। श्री सेठी भी हतप्रभ रह गए मित्रता की ऐसी मिसाल देखकर। राजनीति में रिश्तों की प्रगाढ़ता और अपनापन का ऐसा उदाहरण कभी देखने को नहीं मिला।

भोपाल के नवनिर्मित लिली टॉकीज में डॉ. शर्मा का ऐतिहासिक नागरिक अभिनंदन हुआ, जिसमें राष्ट्रीय स्तर के अनेक दिग्गजों ने भाग लिया। आयोजन के सूत्रधार रहे पिता स्वर्गीय श्री सत्यनारायण श्रीवास्तव ने तब अपने संपादकत्व में डॉ. शर्मा पर केंद्रित एक अभिनंदन ग्रंथ भी प्रकाशित करवाया था, जिसका लोकार्पण भी इसी समारोह में हुआ। तब तत्कालीन प्रधानमंत्री श्रीमती इंदिरा गांधी को भी आमंत्रित किया गया था, लेकिन वे नहीं आ पाई थीं। इस गरिमामय आयोजन की कुछ श्वेत-श्याम, धुंधली हो चुकी तस्वीरें आज भी हमारे पारिवारिक एलबम में हैं। विमोचित अभिनंदन ग्रंथ भी सुरक्षित होकर आज 50 साल बाद भी उपलब्ध है। ग्रंथ में उन अनेक लेखकों ने डॉ. शर्मा के कृतित्व-व्यक्तित्व पर प्रकाश डाला है, जो अब हमारे बीच नहीं है। एक फरवरी 1981 को पिता श्री सत्यनारायण श्रीवास्तव का 52 वर्ष की उम्र में असामयिक निधन हो गया। तब डॉ. शर्मा सांसद थे।भोपाल आने पर सपत्नीक पड़ौस में हमारे घर भी पारिवार को सांत्वना देने आये। तब मैंने उन्हें अपने खास मित्र के खो देने का गम उनकी अश्रुपूरित आंखों में देखा था। काफी देर वे हमारे परिवार के साथ रहे और दिलासा देते रहे। बाद में हम सब नौकरी आदि में लग गए और डा. शर्मा भी उपराष्ट्रपति फिर राष्ट्रपति बने। इन पदों पर रहते हुए वे जब भी भोपाल आए तो विमानतल पर मैं और मेरे बड़े भाई पत्रकार मलय श्रीवास्तव उनसे भेंट करते। तब भी वे अपने मित्र स्व. श्री सत्यनारायण श्रीवास्तव की स्मृतियों में खो जाते। परिवारजनों की कुशलक्षेम आदि उनके द्वारा पूछी जाती। हमें भी यही लगता है कि हमारे परिवार का कोई संरक्षक है जो पिताजी के नहीं रहने के बाद भी हमारी चिंता करता है।