भाजपा कार्यकारिणी : हेमंत ऋतु में ‘मोहन राग’, संघ की सुर-ताल

राजनीतिक विश्लेषण 

भोपाल। मध्यप्रदेश की राजनीति में हेमंत ऋतु पूरी तरह छा चुकी है, और भाजपा की नई प्रदेश कार्यकारिणी में ‘मोहन राग’ तथा ‘संघ के सुर’ स्पष्ट रूप से गूंज रहे हैं। प्रदेश अध्यक्ष हेमंत खंडेलवाल ने अपनी टीम में सत्ता, संगठन और संघ के समीकरणों को इतनी सूक्ष्मता से साधा है कि यह कार्यकारिणी केवल पदों का समूह नहीं, बल्कि राजनीतिक संकेतों का जीवंत दस्तावेज बन गई है।

खंडेलवाल, जो स्वभाव से महाजन (व्यापारी) हैं, ने अपनी महाजनी समझ को राजनीति की रणनीति में कुशलतापूर्वक रूपांतरित किया है। इस कार्यकारिणी में उन्होंने नफा-नुकसान, लाभांश और जोखिम का गणित उसी सटीकता से साधा है, जैसा कोई पारंगत व्यापारी अपनी खाता-बही में करता है। उन्होंने न किसी को पूरी तरह प्रसन्न किया, न किसी को असंतोष के चरम पर पहुंचने दिया, यही उनकी राजनीति की संयत चतुराई है।

25 सदस्यीय कार्यकारिणी में नौ उपाध्यक्ष, चार महामंत्री और नौ प्रदेश मंत्री शामिल किए गए हैं। चारों महामंत्री अपेक्षाकृत युवा हैं, जो यह संकेत देते हैं कि भाजपा अब अनुभव के साथ ऊर्जा, सक्रियता और डिजिटल दक्षता को भी समान महत्व देने लगी है। वरिष्ठ नेताओं को सम्मानजनक स्थान और युवाओं को निर्णायक भूमिका देकर हेमंत ने संगठन में एक स्वाभाविक संक्रमण की शुरुआत की है, जो पार्टी की भविष्य दिशा तय करेगा।

संघ समर्थित चेहरों को यथोचित स्थान देकर यह भी स्पष्ट किया गया है कि संघ का नाभि-बंधन अब भी सुदृढ़ है। क्षेत्रीय और जातीय संतुलन का ध्यान रखते हुए इस बार कार्यकारिणी में मालवा का वर्चस्व साफ झलकता है, जो पहले ग्वालियर-चंबल का हुआ करता था। मालवा से गौरव रणदिवे (इंदौर) और डॉ. सुमेर सिंह सोलंकी (देवास) को महामंत्री बनाया गया है। इस क्षेत्र से दर्जनभर नेताओं (मोर्चा संगठनों सहित ) को प्रतिनिधित्व मिला है। मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव भी इसी क्षेत्र से आते हैं। प्रदेश मीडिया प्रभारी आशीष अग्रवाल की पुनर्नियुक्ति उनके पिछले कार्यकाल की दक्षता का प्रमाण है। मीडिया प्रबंधन में उनके ठोस प्रदर्शन ने भाजपा को लगातार लाभान्वित किया है। हालांकि, प्रदेश महामंत्री (कार्यालय प्रभारी), सह मीडिया प्रभारी और प्रवक्ताओं की नियुक्तियां अभी लंबित हैं।

कार्यकारिणी में शिवराज सिंह चौहान, नरेंद्र सिंह तोमर और ज्योतिरादित्य सिंधिया, तीनों के समर्थकों को शामिल किया गया है। लेकिन यह समावेशन अधिकतर आक्रोश शमन की रणनीति प्रतीत होता है। शिवराज के करीबी आलोक शर्मा और आलोक संजर के नाम भी दबावों के बावजूद कार्यकारिणी में नहीं आ सके, जो इस बात का संकेत है कि मोहन सरकार की सत्ता-संगति अब संगठनात्मक ढांचे में भी परिलक्षित हो रही है।

कार्यकारिणी में महाजनी संतुलन के बावजूद कुछ असंगतियां भी रहीं। उदाहरणत: राहुल कोठारी के नाम के आगे ‘जैन’ जोडऩा चर्चा का विषय बन गया है। भाजपा की परंपरा में जातीय उल्लेख सामान्यत: वर्जित माना जाता है, इसलिए इसके औचित्य पर सवाल उठ रहे हैं। कार्यकारिणी में स्थान न मिलने से वरिष्ठ नेता शैलेंद्र शर्मा का असंतोष भी उभरा। उन्होंने सोशल मीडिया पर लिखा, ‘सूर्य के ढलते ही कल से जुगनूओं का राज होगा, धैर्य से जलते दीयों की अब कीमत नहीं है।’

सारांशत: हेमंत की कार्यकारिणी एक संक्रमणकालीन दस्तावेज़ है। जिसमें नए चेहरों की ताजगी, पुराने समीकरणों की निरंतरता और संघ के अनुशासन का सम्मिलित स्वरूप दिखाई देता है। खंडेलवाल ने यह स्पष्ट संदेश दिया है कि भाजपा अब संतुलन की राजनीति से आगे बढक़र शक्ति और संगठन की नई संरचना तथा नई परिभाषा गढऩे जा रही है। यही वह सूत्र है, जिसमें ‘मोहन की तान, हेमंत का संतुलन और संघ का संयम’ मिलकर मध्यप्रदेश भाजपा की नई ध्वनि रच रहे हैं।