भोपाल। केंद्रीय कृषि एवं किसान कल्याण मंत्री डॉ. शिवराज सिंह चौहान भले ही अब दिल्ली में मोदी दरबार का हिस्सा बन चुके हों, लेकिन मध्यप्रदेश की राजनीति से उनका मोह कम नहीं हो रहा। दिल्ली में बैठे-बैठे भी वे हर दो-चार दिन में भोपाल और विदिशा का रुख कर लेते हैं। दरअसल, शिवराज की राजनीतिक ऊर्जा अब भी मध्यप्रदेश की सियासत में केंद्रित है, मगर पार्टी नेतृत्व ने ऐसी ‘घेराबंदी’ कर दी है कि वे अब पहले जैसी सक्रिय भूमिका में लौट नहीं पा रहे। क्योंकि, केंद्रीय नेतृत्व नहीं चाहता कि शिवराज दोबारा प्रदेश की राजनीति के केंद्र में आएं।
सितंबर और अक्टूबर 2025 के महज़ दो महीनों में ही शिवराज कुल नौ बार मध्यप्रदेश आए। इनमें छह बार भोपाल और तीन बार विदिशा व आसपास के इलाकों का दौरा शामिल है। हर दौरे में वे किसी न किसी बहाने जनता, कार्यकर्ताओं और प्रशासनिक अधिकारियों से संवाद करते दिखे। कभी किसान सम्मेलन, तो कभी केंद्रीय योजनाओं की समीक्षा बैठक, लेकिन उनका असली उद्देश्य प्रदेश की राजनीतिक जमीन पर अपनी पकड़ बनाए रखना है। लेकिन मप्र में उनकी यह लगातार उपस्थिति भाजपा नेतृत्व को असहज कर रही हैं।
केंद्र में सीमित भूमिका, प्रदेश में सिमटती जमीन
मोदी सरकार में मंत्री बनने के बाद शिवराज यह उम्मीद कर रहे थे कि उन्हें केंद्र की राजनीति में भी वैसा ही स्पेस मिलेगा जैसा मप्र में था। लेकिन कृषि मंत्रालय में उनकी भूमिका सीमित रह गई। दूसरी ओर, भाजपा संगठन ने अब मध्यप्रदेश की कमान पूरी तरह मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव और प्रदेश अध्यक्ष हेमंत खंडेलवाल को सौंप दी है। इस नई टीम ने प्रदेश भाजपा में उनके प्रभाव क्षेत्र को योजनाबद्ध तरीके से सीमित कर दिया है। यही वजह है कि शिवराज को बार-बार मप्र लौटकर अपनी प्रासंगिकता साबित करनी पड़ रही है।
अपनों ने बनाई दूरी
इतना ही नहीं, शिवराज के दिल्ली शिफ्ट होते ही कई पुराने साथी अब उनसे दूरी बना चुके हैं। जिन्हें उन्होंने विधायक-सांसद बनाया, जो शिवराज जिंदावाद के नारे लगाते थे, वे भी अब संगठन में नई लाइन के साथ खड़े दिख रहे हैं। राजनीतिक विज्ञानियों का कहना है कि शिवराज खुद को प्रदेश की राजनीति में ‘रिप्रिजेंट’ करने की कोशिश तो कर रहे हैं, मगर उनके पास अब न संगठन की पकड़ रही, न सत्ता की ताकत । मतलब साफ़ है कि, शिवराज के लिए मध्यप्रदेश का दरवाज़ा खुला तो ज़रूर है, लेकिन अंदर आने की अनुमति अब नहीं है।

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