महेश दीक्षित
भारत जैसे लोकतांत्रिक राष्ट्र में, जहां न्यायपालिका को ‘न्याय का मंदिर’ कहा जाता है, वहां गरिमा, अनुशासन और मर्यादा सर्वोपरि मानी जाती हैं। किंतु हाल ही में देश के मुख्य न्यायमूर्ति बीआर गंवई पर एक वकील द्वारा जूता फेंकने की कोशिश ने इस पवित्र गरिमा को कलंकित कर दिया। यह केवल किसी व्यक्ति के आक्रोश की अभिव्यक्ति नहीं, बल्कि भारतीय न्याय परंपरा और उसकी प्रतिष्ठा पर सीधा प्रहार है।
यह घटना न केवल भारत की न्याय व्यवस्था को झकझोरती है, बल्कि करोड़ों देशवासियों के मन में पीड़ा और आक्रोश उत्पन्न करती है। सर्वोच्च न्यायालय जैसी संस्था में इस प्रकार का कृत्य, निस्संदेह भारतीय इतिहास की सबसे शर्मनाक घटनाओं में से एक के रूप में याद किया जाएगा। यह न केवल न्यायालय की मर्यादा पर, बल्कि भारतीय समाज के सभ्य आचरण और अनुशासन पर भी प्रश्नचिन्ह लगाता है।
आरोपी वकील का यह कहना कि मैंने यह कृत्य नशे में नहीं, बल्कि पूरे होश-हवास में किया है, इस घटना को और भी गंभीर बना देता है। यह कथन एक व्यक्ति के अहंकार का नहीं, बल्कि उस अराजक मानसिकता का द्योतक है जो संवाद और विचार के स्थान पर हिंसा और अपमान को माध्यम बना लेती है। यह प्रवृत्ति न केवल भारतीय सनातन धर्म-संस्कृति के मूल्यों के विपरीत है, बल्कि सामाजिक सौहार्द और विधि-सम्मत व्यवस्था के लिए भी अत्यंत घातक है।
यह सही है कि न्यायमूर्ति गंवई द्वारा भगवान विष्णु को लेकर की गई टिप्पणी ने हिंदू समाज के एक वर्ग को उद्वेलित किया। धार्मिक भावनाएं स्वाभाविक रूप से संवेदनशील होती हैं, उनका सम्मान किया जाना चाहिए। परंतु किसी भी असहमति या आक्रोश का समाधान हिंसक प्रतिक्रिया से नहीं, बल्कि संविधान, संवाद और संयम के मार्ग से ही संभव है। न्यायालय में जूता फेंकना या किसी न्यायाधीश का अपमान करना न तो श्रद्धा बढ़ाता है और न ही आस्था को बल देता है- उलटे यह न्याय व्यवस्था के प्रति अविश्वास और असंयम का प्रतीक बन जाता है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने भी इस घटना की कठोर निंदा करते हुए कहा कि सर्वोच्च न्यायालय में हुआ यह आक्रमण हर भारतीय को क्रोधित और आहत करने वाला है। उन्होंने मुख्य न्यायमूर्ति गंवई के धैर्य और संयम की प्रशंसा करते हुए कहा कि उनका शांत व्यवहार न्याय और संविधान के प्रति उनकी गहरी निष्ठा का प्रमाण है।
हालांकि, यह कोई पहली घटना नहीं है जब न्याय के इस मंदिर की मर्यादा भंग हुई हो। वर्ष 1968 में एक व्यक्ति ने सुप्रीम कोर्ट की बेंच पर छलांग लगाकर चाकू जैसा हथियार लहराया था, जिससे न्यायाधीश ग्रोवर घायल हो गए थे। वर्ष 2009 में एक महिला ने न्यायमूर्ति अरजीत पसायत पर सुनवाई के दौरान चप्पल फेंकी थी। ऐसी घटनाएं भले ही विरल हों, लेकिन जब-जब घटित होती हैं, न्यायपालिका की गरिमा को गहरा आघात पहुंचाती हैं।
आज आवश्यकता इस बात की है कि न्यायालय के मंदिरों की सुरक्षा व्यवस्था को और सुदृढ़ किया जाए, और आमजन में न्यायपालिका के प्रति सम्मान का भाव और प्रगाढ़ हो। वकील समुदाय को भी आत्ममंथन करना होगा कि जो पेशा संविधान की रक्षा और सत्य के समर्थन का प्रतीक है, वही यदि अनुशासन तोड़ेगा तो समाज को क्या संदेश देगा?
भारत की न्याय परंपरा सदैव इस सिद्धांत पर आधारित रही है कि, न्याय देरी से मिले, पर अन्याय कभी न हो। इस परंपरा को चोट पहुंचाने वाला हर कृत्य राष्ट्र की आत्मा पर प्रहार है। इसलिए यह आवश्यक है कि ऐसी घटनाओं की न केवल सख्त निंदा की जाए, बल्कि उनका कानूनी प्रतिकार भी सुनिश्चित किया जाए, ताकि न्याय के मंदिर की पवित्रता सदा अक्षुण्ण रहे। क्योंकि अब भी आम नागरिक की अंतिम आस, न्याय के मंदिरों से ही बची है।

More Stories
Rafale डील की पूरी जानकारी: इमैनुएल मैक्रों भारत आए क्यों, और 3.25 लाख करोड़ की डील में क्या है खास
अप्रैल से लागू हो सकता है भारत-UK समझौता, 99% भारतीय उत्पादों को मिलेगा जीरो-ड्यूटी लाभ
अगर AI कर देगा सारे काम, तो 800 करोड़ लोग क्या करेंगे? क्या नौकरियां सच में खत्म होंगी?