January 15, 2026

क्या ‘आलोक’ भेद पाएगा ‘आरिफ’ का औरा

  • विधानसभा चुनाव- कांग्रेस के सबसे बड़े गढ़ में भोपाल उत्तर विधानसभा क्षेत्र में भाजपा ने तीन महीने पहले भरी हुंकार

जगदीश ज्ञानचंदानी, भोपाल. कहने को तो भोपाल भाजपा का गढ़ माना जाता है, लेकिन भाजपा तमाम कोशिशों के बाद भी कांग्रेस का गढ़ बन चुके भोपाल उत्तर विधानसभा क्षेत्र के लोगों का मन नहीं जीत पाई। पिछले 30 साल से इस सीट से कांग्रेस और आरिफ अकील अजेय योद्धा बने हुए हैं। यहां से भाजपा ने भोपाली संस्कृति में रचे-बसे हिंदूवादी नेता पूर्व महापौर आलोक शर्मा को अपना उम्मीदवार बनाया है। ऐसे में सवाल उठ रहे हैं क्या ‘आलोक’ (प्रकाश) ‘आरिफ’ (जिसका अर्थ होता है ईश्वर का जानकार) के राजनीतिक ‘औरा’ को भेद पाएगा? उत्तर विधानसभा का राजनीतिक इतिहास बदल पाएगा?

भाजपा ने विधानसभा चुनाव से तीन महीने पहले उत्तर विधानसभा सीट से आलोक शर्मा को अपना उम्मीदवार बनाया है। आलोक शर्मा पहले भी कांग्रेस से वर्तमान विधायक आरिफ अकील को टक्कर दे चुके हैं, लेकिन उन्हें हार का सामना करना पड़ा था। ऐसा पहली बार हुआ है, जब आचार संहिता लगने के पहले भाजपा ने प्रत्याशियों की घोषणा की है। हम बता दें कि भाजपा के वरिष्ठ नेता आलोक शर्मा भोपाल के महापौर रह चुके हैं। वे मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान के सबसे करीबी माने जाते हैं। इसके साथ भोपाल में उनकी अपनी अलग पहचान और फालोइंग है। उन्होंने 2008 के विधानसभा चुनाव में आरिफ अकील के खिलाफ इसी उत्तर विधानसभा क्षेत्र से चुनाव लड़ा था और उन्हें 4026 वोटों से हार का सामना करना पड़ा था। ये अंतर बेहद ही कम था। यही वजह है कि भाजपा ने दोबारा आलोक शर्मा को मौका दिया है, क्योंकि इसके पहले 2018 के विधानसभा चुनाव में आरिफ अकील ने भाजपा की फातिमा रसूल सिद्दीकी को 34,897 वोटो से हराया था, जिसे हार-जीत के बड़े अंतर के रूप में देखा गया था। इसीलिए भाजपा ने भोपाली आलोक शर्मा पर भरोसा जताते हुए उन्हें उत्तर विधानसभा क्षेत्र से उम्मीदवार बनाया है।

विधानसभा का राजनीतिक गणित

इस विधानसभा क्षेत्र में वोटर्स की संख्या 239,717 है। जिनमें 118,052 महिला और 120, 654 पुरुष वोटर्स हैं। पिछले 30 सालों से यह सीट कांग्रेस के कब्जे में है और यहां से कांग्रेस के आरिफ अकील लगातार 30 सालों से विधायक बने हुए हैं, परन्तु इस बार का चुनाव काफी रोचक होने के आसार हैं क्योंकि आलोक को चुनाव के लिए पर्याप्त समय मिल गया है जिससे वे क्षेत्र में मतदाताओं से संवाद स्थापित कर सकते हैं वही दूसरी ओर आरिफ अकील के चुनाव ना लड़ने की स्थिति में भीतरघात से इंकार नहीं किया जा सकता जिसका फायदा भाजपा को मिल सकता है।

कौन कब जीता

इस विधानसभा सीट पर 1977 में पहली बार चुनाव हुए। यहां से मुस्लिम विधायक हामिद कुरैशी जनता पार्टी से विधायक चुने गए थे। इसके बाद 1980 में रसूल अहमद सिद्दीकी कांग्रेस से विधायक बने। 1990 में आरिफ अकील पहली बार उत्तर विधानसभा से निर्दलीय चुनाव लडक़र विधायक बने थे.। लेकिन 1993 में भाजपा के रमेश शर्मा उर्फ गुट्टू भैया ने आरिफ अकील को हरा दिया था, लेकिन उसके बाद से आरिफ अकील लगातार इस क्षेत्र में अपना दबदबा बनाए हुए हैं। हालांकि स्वास्थ्य खराब होने की वजह से उनके बेटे को उन्होंने उत्तराधिकारी घोषित किया, लेकिन इस बार भाजपा सीट को किसी भी कीमत में जीतना चाहती है।