संसार जिसे प्राप्त करके प्रसन्न होता है, ज्ञानी उसी के पार जाने का मार्ग खोजता है। कंचन शरीर को सुख दे सकता है, कामिनी मन को आकर्षित कर सकती है और कीर्ति संसार में नाम दे सकती है, लेकिन इनमें से कोई भी मृत्यु, मोह, भय और अंतहीन असंतोष से मुक्ति नहीं दे सकता।
यदि कंचन, कामिनी और कीर्ति में ही जीवन का सच्चा सुख छिपा होता, तो फिर गौतम बुद्ध और भगवान महावीर जैसे राजकुमारों ने इन सबका त्याग क्यों किया होता। गौतम बुद्ध के पास कपिलवस्तु का राजपाट था, यशोधरा जैसी रूपवती और गुणवती पत्नी थीं, राहुल जैसा फूल-सा सुंदर पुत्र था और पिता महाराज शुद्धोदन की अर्जित हुई अपार प्रतिष्ठा भी थी। जीवन में भौतिक सुख-सुविधाओं की कोई कमी नहीं थी, फिर भी उनके भीतर एक प्रश्न लगातार उठता रहा, क्या यही जीवन का अंतिम सत्य है। एक रात वे यशोधरा और राहुल को सोता हुआ छोड़कर महल से निकल पड़े। उन्होंने अपने भीतर संकल्प लिया कि जब तक जीवन के दुःख का कारण और उसके निवारण का मार्ग नहीं खोज लेंगे, तब तक कपिलवस्तु वापस नहीं लौटेंगे।
धन आदि जीवन को सुख-सुविधाएं तो दे सकते हैं, लेकिन मन को स्थायी शांति नहीं दे सकते, वास्तविक सुख बाहर की वस्तुओं में न होकर भीतर के संतोष, और आत्मबोध में छिपा है। कंचन अर्थात धन-वैभव, कामिनी अर्थात सांसारिक प्रेम और आकर्षण तथा कीर्ति अर्थात यश-प्रतिष्ठा, ये तीनों मनुष्य को संसार में सुखी होने का भ्रम दे सकते हैं, लेकिन आत्मा को वह शांति नहीं दे सकते।
सुख प्राप्ति का सम्भवतः एक दूसरा भी उपाय है, कि हम सुख और दुःख में संतुलित रहना सीखें। सुख प्राप्त करने के लिए मानसिक शांति आवश्यक है। यह संसार एवं जीवन द्वंदात्मक है, सुख-दुःख, निन्दा-स्तुति, जय-पराजय, लाभ-हानि, जन्म-मृत्यु, संयोग-वियोग आदि, यानि सृष्टि ही द्वंदात्मक है।

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