भोपाल
भोपाल गैस त्रासदी के तीन दशक बाद भी यूनियन कार्बाइड संयंत्र का जहरीला कचरा कानूनी और पर्यावरणीय विवादों के केंद्र में है। सुप्रीम कोर्ट ने इस कचरे को जलाने के बाद बची राख से पारे के संभावित रिसाव से जुड़ी याचिका पर सुनवाई करने से इनकार कर दिया। शीर्ष अदालत ने याचिकाकर्ता संगठन भोपाल गैस पीड़ित संघर्ष सहयोग समिति को राहत के लिए मध्य प्रदेश हाईकोर्ट जाने का निर्देश दिया है।
हाईकोर्ट की 20 साल पुरानी निगरानी का हवाला
मुख्य न्यायाधीश सूर्य कांत और न्यायमूर्ति जॉय माल्या बागची की पीठ ने सुनवाई के दौरान स्पष्ट किया कि यह संवेदनशील मामला पिछले दो दशकों से मध्य प्रदेश हाईकोर्ट की सीधी निगरानी में चल रहा है। बेंच ने कहा कि तकनीकी साक्ष्यों और नई सामग्री के साथ हाईकोर्ट में आवेदन करना अधिक व्यावहारिक और उचित होगा। याचिका में दावा किया गया था कि कचरे के अवशेषों में भारी मात्रा में पारा हो सकता है, जो आसपास के भूजल और पर्यावरण के लिए बड़ा खतरा है।
क्या है विशेषज्ञों की राय?
सुनवाई के दौरान अदालत ने तकनीकी बारीकियों पर टिप्पणी करने से परहेज किया। न्यायमूर्ति बागची ने कहा कि जब विशेषज्ञ समितियों और निजी विशेषज्ञों की राय अलग-अलग हो, तो कोर्ट सीधे हस्तक्षेप नहीं कर सकता। याचिकाकर्ताओं ने डॉ. आसिफ कुरैशी की रिपोर्ट का हवाला देते हुए ट्रायल रन की पद्धति पर सवाल उठाए थे।
यदि भविष्य में पारे के रिसाव से संबंधित कोई नई सामग्री या तकनीकी आपत्ति सामने आती है, तो याचिकाकर्ता हाईकोर्ट के समक्ष आवेदन कर सकते हैं। हमें उम्मीद है कि हाईकोर्ट इस मुद्दे पर जल्द विचार करेगा।
क्या है पूरा मामला?
यह मामला पीथमपुर (धार) स्थित ट्रीटमेंट प्लांट और भोपाल के यूनियन कार्बाइड परिसर से जुड़ा है। दिसंबर 2024 में प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड के एक नोटिस ने खलबली मचा दी थी, जिसमें दावा किया गया था कि जहरीले तत्व भूजल में रिस रहे हैं। याचिकाकर्ताओं की मांग थी कि कंक्रीट की पेटियों में बंद राख की दोबारा जांच हो, जिसे फिलहाल सुप्रीम कोर्ट ने ठुकरा दिया है।

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