नई दिल्ली। राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू द्वारा अनुच्छेद 143(1) के तहत भेजे गए संदर्भ पर सुप्रीम कोर्ट की संविधान पीठ ने 10 दिनों तक चली सुनवाई गुरुवार 11 सितंबर को पूरी कर ली और फैसला सुरक्षित रख लिया। यह अहम सवाल सुप्रीम कोर्ट के सामने था कि क्या संवैधानिक अदालतें राज्यपालों और राष्ट्रपति के लिए राज्य विधानसभाओं द्वारा पारित विधेयकों पर मंजूरी देने की समयसीमा तय कर सकती हैं?
इस मामले पर मुख्य न्यायाधीश (सीजेआई) जस्टिस बीआर गवई की अध्यक्षता वाली पांच सदस्यीय संविधान पीठ में जस्टिस सूर्यकांत, जस्टिस विक्रमनाथ, जस्टिस पीएस नरसिम्हा और जस्टिस एएस चंदुरकर शामिल थे। सुनवाई 19 अगस्त से शुरू हुई थी, जो गुरुवार को अटॉर्नी जनरल आर वेंकटरमणी की दलीलों के साथ समाप्त हुई। सुनवाई पूरी करते हुए अदालत ने फैसला सुरक्षित रख लिया सुनवाई के दौरान सीजेआई गवई ने महत्वपूर्ण टिप्पणी करते हुए कहा, मैं शक्तियों के पृथक्करण में विश्वास रखता हूं। न्यायिक सक्रियता होनी चाहिए, लेकिन यह न्यायिक दुस्साहस में नहीं बदलनी चाहिए। फिर भी, यदि लोकतंत्र का एक पक्ष अपने कर्तव्यों का निर्वहन नहीं करता, तो क्या संविधान का संरक्षक न्यायालय हाथ पर हाथ धरे बैठा रह सकता है? केंद्र सरकार की ओर से पेश सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने इसका विरोध करते हुए कहा कि कार्यपालिका और विधायिका भी संविधान की संरक्षक हैं। उन्होंने तर्क दिया कि यदि न्यायालय राज्यपाल जैसे संवैधानिक पदाधिकारियों के विवेकाधिकार पर समयसीमा थोपेगा, तो यह शक्तियों के पृथक्करण के सिद्धांत का उल्लंघन होगा।
गौरतलब है कि राष्ट्रपति ने मई 2024 में यह संदर्भ भेजा था। यह मामला उस समय सामने आया जबकि सुप्रीम कोर्ट ने 8 अप्रैल को कहा था कि राज्यपाल विधेयकों पर उचित समय सीमा में निर्णय लें और संवैधानिक चुप्पी का सहारा लेकर लोकतांत्रिक प्रक्रिया को बाधित न करें। इस फैसले पर विवाद खड़ा हुआ था, खासकर तमिलनाडु, पश्चिम बंगाल, केरल, कर्नाटक, तेलंगाना, पंजाब और हिमाचल प्रदेश जैसे विपक्ष-शासित राज्यों ने इसका समर्थन किया और राज्यपालों के आचरण पर सवाल उठाए। इसी मामले को लेकर राष्ट्रपति ने अपने पांच पृष्ठों के संदर्भ में कुल 14 सवाल रखे, जिनमें यह जानना चाहा गया कि अनुच्छेद 200 और 201 के तहत राज्यपाल और राष्ट्रपति की शक्तियों का दायरा क्या है और क्या इन पदों पर निर्णय लेने के लिए समयसीमा तय की जा सकती है।
अब सबकी निगाहें सुप्रीम कोर्ट के फैसले पर हैं, जो न केवल संवैधानिक व्यवस्था को स्पष्ट करेगा बल्कि केंद्र-राज्य संबंधों और राज्यपालों की भूमिका पर भी दूरगामी प्रभाव डालेगा। माना जा रहा है कि इस पर फैसला दो महीने के भीतर आ सकता है, क्योंकि 23 नवंबर को सीजेआई गवई सेवानिवृत्त हो रहे हैं।

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