भारतीय सनातन धर्म की पौराणिक कथाओं के अनुसार महान दानी महर्षि दधीचि की जयंती भाद्रपद शुक्ल पक्ष की नवमी तिथि को मनाई जाती है. इस बार 23 सितंबर दिन शनिवार को ऋषि दधीचि की जयंती मनाई जाएगी. बता दें हिंदू धर्म ग्रंथों में दानशीलता की कई कथा-कहानी प्रसिद्ध है. इनमें दानवीर ऋषि दधीचि की कथा भी प्रमुख स्थान रखती है.
भगवान शिव के भक्त थे महर्षि दधीचि
महर्षि दधीची महातपोबली और शिव भक्त ऋषि थे. वह संसार के लिए कल्याण व त्याग की भावना रख वृत्रासुर का नाश करने के लिए अपनी अस्थियों का दान करने की वजह से बड़े पूजनीय हुए. इस संबंध में पौराणिक कथा है कि एक बार देवराज इंद्र की सभा में देवगुरु बृहस्पति आए अहंकार से चूर इंद्र गुरु बृहस्पति के सम्मान में उठकर खड़े नहीं हुए. बृहस्पति ने इसे अपना अपमान समझा और देवताओं को छोड़कर चले गए.
देवताओं को विश्वरूप को अपना गुरु बनाकर काम चलाना पड़ा परन्तु विश्वरूप देवताओं से छिपाकर असुरों को भी यज्ञ भाग दे देता था. इंद्र ने उस पर आवेशित होकर उसका सिर काट दिया. विश्वरूप त्वष्टा ऋषि का पुत्र था. उन्होंने क्रोधित होकर इंद्र को मारने के लिए महाबली वृत्रासुर को पैदा किया. वृत्रासुर के भय से इंद्र अपना सिंहासन छोड़कर देवताओं के साथ इधर-उधर भटकने लगे.
वृत्रासुर को मारने के लिए अपनी हड्डियों का किया दान
ऋषि दधिचि की कथा के अनुसार ब्रह्मदेव ने वृत्रासुर को मारने के लिए वज्र बनाने के लिए देवराज इंद्र को तपोबली महर्षि दधीचि के पास उनकी हड्डियां मांगने के लिए भेजा था. उन्होंने महर्षि से प्रार्थना करते हुए तीनों लोकों की भलाई के लिए उनकी हड्डियां दान में मांगी.

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