February 17, 2026

भारत का अंतरराष्ट्रीय व्यापार किसी के दबाव में नहीं, स्वेच्छा से होना चाहिए

100 वर्ष की संघ यात्रा पर आयोजित व्याख्यानमाला में सरसंघ चालक डॉ मोहन भागवत का संबोधन

नई दिल्ली। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) के सरसंघचालक डॉ. मोहन भागवत ने कहा है कि संघ का कार्य शुद्ध सात्विक प्रेम और समाजनिष्ठा पर आधारित है। संघ का स्वयंसेवक कोई व्यक्तिगत लाभ की अपेक्षा नहीं रखता। यहां इंसेंटिव नहीं हैं, बल्कि डिसइंसेंटिव अधिक हैं। स्वयंसेवक समाज-कार्य में आनंद का अनुभव करते हुए कार्य करते हैं। उन्होंने कहा कि आत्मनिर्भर भारत के लिए स्वदेशी को प्राथमिकता दें तथा भारत का अंतरराष्ट्रीय व्यापार केवल स्वेच्छा से होना चाहिए, किसी दबाव में नहीं।

सरसंघचालक डॉ. मोहन भागवत संघ शताब्दी वर्ष के उपलक्ष्य में विज्ञान भवन में आयोजित तीन दिवसीय व्याख्यानमाला 100 वर्ष की संघ यात्रा – नए क्षितिज के दूसरे दिन बुधवार को संबोधित कर रहे थे। इस दौरान सरकार्यवाह दत्तात्रेय होसबाले, उत्तर क्षेत्र के प्रांत संघचालक पवन जिंदल और दिल्ली प्रांत संघचालक डॉ. अनिल अग्रवाल मंच पर उपस्थित रहे। सरसंघचालक ने चिंता जताई कि दुनिया कट्टरता, कलह और अशांति की ओर जा रही है। पिछले साढ़े तीन सौ वर्षों में उपभोगवादी और जड़वादी दृष्टि के कारण मानव जीवन का वैभव क्षीण हुआ है। उन्होंने गांधी जी के बताए सात सामाजिक पापों, काम बिना परिश्रम, आनंद बिना विवेक, ज्ञान बिना चरित्र, व्यापार बिना नैतिकता, विज्ञान बिना मानवता, धर्म बिना बलिदान और राजनीति बिना सिद्धांत का, उल्लेख करते हुए कहा कि इनसे समाज में असंतुलन गहराता गया है।

दुनिया को नजरिया बदलना होगा
सरसंघ चालक डॉ भागवत ने कहा कि आज दुनिया में समन्वय का अभाव है और दुनिया को अपना नजरिया बदलना होगा। दुनिया को धर्म का मार्ग अपनाना होगा। धर्म पूजा-पाठ और कर्मकांड से परे है। धर्म सभी प्रकार के रिलीजन से ऊपर है। धर्म हमें संतुलन सिखाता है – हमें भी जीना है, समाज को भी जीना है और प्रकृति का भी संरक्षण करना है। धर्म ही मध्यम मार्ग है जो अतिवाद से बचाता है। धर्म का अर्थ है मर्यादा और संतुलन के साथ जीना। इसी दृष्टिकोण से ही विश्व शांति स्थापित हो सकती है। उन्होंने कहा कि आज समाज में संघ की साख पर विश्वास है। संघ जो कहता है, उसे समाज सुनता है।यह विश्वास सेवा और समाजनिष्ठा से अर्जित हुआ है।

संघ का उद्धेश्य सभी वर्गों तक पहुंचना है
भविष्य की दिशा पर सरसंघचालक ने कहा कि संघ का उद्देश्य है कि सभी स्थानों, वर्गों और स्तरों पर संघ कार्य पहुँचे। साथ ही समाज में अच्छा काम करने वाली सज्जन शक्ति आपस में जुड़े। इससे समाज स्वयं संघ की ही तरह चरित्र निर्माण और देशभक्ति के कार्य को करेगा। इसके लिए हमें समाज के कोने-कोने तक पहुंचना होगा। भौगोलिक दृष्टि से सभी स्थानों और समाज के सभी वर्गों एवं स्तरों में संघ की शाखा पहुंचानी होगी। सज्जन शक्ति से हम संपर्क करेंगे और उनका आपस में भी संपर्क कराएंगे।

आत्म निर्भर मॉडल प्रस्तुत करना होगा
आर्थिक दृष्टि पर उन्होंने कहा कि छोटे-छोटे प्रयोग हुए हैं, लेकिन अब राष्ट्रीय स्तर पर आर्थिक प्रतिमान गढऩा होगा। हमें एक ऐसा विकास मॉडल प्रस्तुत करना होगा, जिसमें आत्मनिर्भरता, स्वदेशी और पर्यावरण का संतुलन हो। ताकि वे विश्व के लिए उदाहरण बने। पड़ोसी देशों से रिश्तों पर उन्होंने कहा कि नदियाँ, पहाड़ और लोग वही हैं, केवल नक्शे पर लकीरें खींची गई हैं। विरासत में मिले मूल्यों से सबकी प्रगति हो, इसके लिए उन्हें जोडऩा होगा। पंथ और संप्रदाय अलग हो सकते हैं, पर संस्कारों पर मतभेद नहीं है।