भोपाल
सनातन संस्कृति में मनुष्य की महानता का आधार उसकी शारीरिक संरचना नहीं बल्कि उसके गुण, कर्म और आत्मबल को माना गया है। श्रीमद्भगवद्गीता में भगवान श्रीकृष्ण ने संदेश दिया है कि- “उद्धरेदात्मनात्मानं नात्मानमवसादयेत्” अर्थात मनुष्य को अपने प्रयास और पुरुषार्थ से अपना उत्थान करना चाहिए और स्वयं को कभी भी निराशा में नहीं डूबने देना चाहिए। भारतीय पैरा खिलाड़ियों का जीवन इसी शाश्वत संदेश का सजीव उदाहरण है, जहाँ चुनौतियाँ बाधा नहीं बल्कि अपनी क्षमता सिद्ध करने का अवसर बन जाती हैं। प्रकृति ने हर व्यक्ति को एक समान शारीरिक क्षमताएँ नहीं दी हैं। किसी के जीवन में जन्मजात शारीरिक चुनौतियाँ हैं, तो किसी को दुर्घटना या बीमारी के कारण कठिन परिस्थितियों का सामना करना पड़ता है। लेकिन इन परिस्थितियों के बावजूद जब कोई व्यक्ति अपने भीतर के साहस को पहचानता है, निरंतर साधना करता है और अपनी कमजोरियों को अपनी शक्ति में बदलने का संकल्प लेता है, तो उसकी उपलब्धि केवल व्यक्तिगत सफलता नहीं रह जाती बल्कि वह समूचे समाज और राष्ट्र के लिए प्रेरणा बन जाती है।
इसी प्रेरणादायी भावना को भारतीय पैरा खिलाड़ियों ने जापान के आइची-नागोया में आयोजित एशियन पैरा गेम्स-2026 में अपने शानदार प्रदर्शन से वैश्विक पहचान दी है। भारत के पैरा खिलाड़ियों ने कुल 114 पदक जिसमें 30 स्वर्ण, 35 रजत और 49 कांस्य जीतकर अपना अब तक का सर्वश्रेष्ठ प्रदर्शन किया और पदक तालिका में देश को शीर्ष चार में स्थान हासिल करने का गौरव दिलाया है।
इन खिलाड़ियों ने दुनिया को बताया है कि दिव्यांगता किसी व्यक्ति की पहचान का संपूर्ण परिचय नहीं है और न ही उसकी संभावनाओं का अंतिम निर्धारण होता है। उनकी पहचान उनका परिश्रम, उनका अनुशासन, उनका साहस और अपने देश के लिए कुछ असाधारण कर गुजरने का उनका संकल्प है। वे केवल खेल के मैदान में प्रतिद्वंद्वियों को चुनौती नहीं देते बल्कि समाज में व्याप्त उन धारणाओं को भी चुनौती देते हैं, जो किसी व्यक्ति की क्षमताओं का आकलन उसकी शारीरिक सीमाओं के आधार पर करती हैं।
देश के यशस्वी प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी जी ने दिव्यांगजनों के प्रति समाज की सोच में सकारात्मक परिवर्तन लाने और उनके सामर्थ्य को नई पहचान दिलाने की दिशा में कई सार्थक प्रयास किए हैं। उन्होंने ‘विकलांग’ के स्थान पर ‘दिव्यांग’ शब्द का प्रयोग कर यह संदेश दिया कि किसी व्यक्ति की पहचान उसकी शारीरिक सीमाओं से नहीं बल्कि उसकी अंतर्निहित क्षमताओं, प्रतिभा और संकल्प से होनी चाहिए। यह पहल केवल शब्द परिवर्तन नहीं बल्कि सम्मान, संवेदनशीलता और समावेशी सोच को प्रोत्साहित करने का एक सार्थक प्रयास रहा है।
प्रधानमंत्री जी ने खेलों को राष्ट्रीय विकास और युवा सशक्तीकरण का महत्वपूर्ण माध्यम बनाते हुए खिलाड़ियों को बेहतर अवसर उपलब्ध कराने पर विशेष जोर दिया है। उनके नेतृत्व में खेलो इंडिया और टारगेट ओलंपिक पोडियम योजना (TOPS) जैसी पहलों के माध्यम से प्रतिभाशाली खिलाड़ियों की पहचान, प्रशिक्षण और अंतरराष्ट्रीय प्रतियोगिताओं की तैयारी को प्रोत्साहित किया जा रहा है। पैरा खिलाड़ियों के लिए भी समान अवसर, आधुनिक प्रशिक्षण सुविधाएँ, उपयुक्त खेल उपकरण और आवश्यक सहयोग उपलब्ध कराना खेल व्यवस्था को अधिक समावेशी बनाने की दिशा में महत्वपूर्ण है। सरकार के प्रयासों, प्रशिक्षकों के मार्गदर्शन, परिवारों के सहयोग और खिलाड़ियों के अथक परिश्रम के समन्वय से भारतीय पैरा खिलाड़ी अंतरराष्ट्रीय मंच पर अपनी प्रतिभा का शानदार प्रदर्शन कर रहे हैं।
एशियन पैरा गेम्स 2026 में भारत ने 30 स्वर्ण, 35 रजत और 49 कांस्य पदकों के साथ कुल 114 पदक अपने नाम किए। यह प्रदर्शन भारतीय पैरा खेलों में बढ़ती प्रतिस्पर्धात्मक क्षमता और खिलाड़ियों के निरंतर प्रयासों का परिचायक है। इस उपलब्धि का सबसे उल्लेखनीय पहलू विभिन्न खेलों में भारतीय खिलाड़ियों का प्रभावशाली प्रदर्शन रहा है। पैरा एथलेटिक्स ने भारत की पदक तालिका में सबसे बड़ा योगदान दिया है। खिलाड़ियों ने दौड़, जंप, जैवलिन थ्रो, डिस्कस थ्रो और क्लब थ्रो जैसी स्पर्धाओं में अपनी प्रतिभा का प्रदर्शन किया है। वहीं पैरा शूटिंग, पैरा आर्चरी, पैरा बैडमिंटन, पैरा पावरलिफ्टिंग और पैरा जूडो में भी भारतीय खिलाड़ियों ने देश को गौरवान्वित किया है।
भारत के पदक अभियान की शुरुआत महिलाओं की 10 मीटर एयर राइफल स्टैंडिंग SH1 स्पर्धा में शानदार प्रदर्शन के साथ हुई। जिसमें मोना अग्रवाल ने स्वर्ण पदक जीता, जबकि अवनि लेखरा ने रजत पदक अपने नाम किया। एक ही स्पर्धा में पहले और दूसरे स्थान पर भारतीय खिलाड़ियों का कब्जा देश की बेटियों की प्रतिभा, एकाग्रता और प्रतिस्पर्धात्मक क्षमता का प्रमाण है।
निशानेबाजी ऐसा खेल है, जिसमें एकाग्रता, धैर्य, मानसिक संतुलन और तकनीकी दक्षता की निर्णायक भूमिका होती है। मोना अग्रवाल और अवनि लेखरा ने अपने प्रदर्शन से दिखाया कि दृढ़ संकल्प और अनुशासित अभ्यास के बल पर अंतरराष्ट्रीय स्तर पर उत्कृष्टता हासिल की जा सकती है। मोना अग्रवाल ने आगे भी अपनी सफलता का सिलसिला जारी रखते हुए 50 मीटर राइफल थ्री पोजीशन स्पर्धा में स्वर्ण पदक हासिल किया। इस प्रकार उन्होंने प्रतियोगिता में दो स्वर्ण पदक अपने नाम किए। उनकी उपलब्धि निरंतरता, आत्मविश्वास और उत्कृष्ट प्रदर्शन का प्रेरक उदाहरण है।
भारत की ऐतिहासिक सफलता में पैरा एथलेटिक्स का योगदान सबसे अधिक रहा है। इस स्पर्धा में भारतीय खिलाड़ियों ने कुल 65 पदक जीते, जिनमें 22 स्वर्ण पदक शामिल थे। यह प्रदर्शन बताता है कि भारतीय पैरा एथलेटिक्स में प्रतिभा, प्रशिक्षण और प्रतिस्पर्धा का स्तर लगातार आगे बढ़ रहा है। दो बार के पैरालंपिक चैंपियन सुमित अंतिल ने पुरुषों की जैवलिन थ्रो स्पर्धा में अपना खिताब बरकरार रखते हुए स्वर्ण पदक हासिल किया और उनकी सफलता के साथ महेंद्र गुर्जर ने रजत और संदीप संजय सरगर ने कांस्य पदक हासिल किया। इस प्रकार भारतीय खिलाड़ियों ने इस स्पर्धा में तीनों पदक अपने नाम कर ऐतिहासिक क्लीन स्वीप का रिकॉर्ड भी बनाया है। एक ही स्पर्धा में तीनों पदकों पर भारत का कब्जा खिलाड़ियों की व्यक्तिगत प्रतिभा के साथ-साथ भारतीय पैरा एथलेटिक्स की व्यापक क्षमता का प्रमाण है। सुमित अंतिल की निरंतरता, महेंद्र गुर्जर का उत्कृष्ट प्रदर्शन और संदीप संजय सरगर की उपलब्धि युवा खिलाड़ियों के लिए प्रेरणा है।
वहीं प्रणव सूरमा ने डिस्कस थ्रो और क्लब थ्रो में स्वर्ण पदक जीतकर अपनी बहुमुखी प्रतिभा का परिचय दिया है। सिमरन ने महिलाओं की T12 श्रेणी में 100 मीटर और 200 मीटर की दौड़ में स्वर्ण पदक हासिल किए। दिलीप महादु गावित ने 100 मीटर और 400 मीटर की T47 स्पर्धाओं में जीत दर्ज की, जबकि निषाद कुमार ने लॉन्ग जंप और हाई जंप में स्वर्ण पदक अपने नाम किए हैं।
इन खिलाड़ियों की उपलब्धियाँ बताती हैं कि पैरा खेलों में उत्कृष्टता किसी एक स्पर्धा या श्रेणी तक सीमित नहीं है। ट्रैक से लेकर फील्ड तक, हर जगह भारतीय खिलाड़ियों ने अपनी मेहनत और क्षमता का परिचय दिया है।
भारतीय पैरा आर्चरी की प्रतिभाशाली खिलाड़ी शीतल देवी ने आइची-नागोया में अपने प्रदर्शन से देश का गौरव बढ़ाया है। उन्होंने महिलाओं की व्यक्तिगत कंपाउंड और मिक्स्ड कंपाउंड स्पर्धाओं में स्वर्ण पदक जीते हैं। वे प्रतियोगिता में एक से अधिक स्वर्ण पदक जीतने वाले छह भारतीय खिलाड़ियों में शामिल रहीं है। महिलाओं की कंपाउंड डबल्स स्पर्धा में शीतल देवी और पायल नाग ने रजत पदक हासिल किया है। इन उपलब्धियों ने भारतीय पैरा आर्चरी की प्रतिस्पर्धात्मक क्षमता को नई पहचान दी है।
शीतल देवी की यह सफलता प्रमाण है कि किसी खिलाड़ी की असली ताकत केवल उसकी शारीरिक क्षमता में नहीं बल्कि उसकी तकनीक, एकाग्रता, अभ्यास और स्वयं पर विश्वास में निहित होती है। उन्होंने अपने प्रदर्शन से यह संदेश दिया कि लक्ष्य के प्रति समर्पण और निरंतर मेहनत से असाधारण उपलब्धियाँ हासिल होती हैं। पायल नाग की सफलता भी उतनी ही महत्वपूर्ण है उन्होंने रजत पदक जीतकर यह साबित किया कि भारतीय पैरा खेलों में नई प्रतिभाएँ लगातार उभर रही हैं और देश का भविष्य प्रतिभाशाली खिलाड़ियों के हाथों में सुरक्षित है।
एशियन पैरा गेम्स में भारतीय खिलाड़ियों ने कई खेलों में अपनी छाप छोड़ी है। पैरा पावरलिफ्टिंग में कस्तूरी राजामणि ने रजत पदक जीतकर देश का मान बढ़ाया है। पैरा शूटिंग में खिलाड़ियों ने सटीक निशाने और मानसिक दृढ़ता का परिचय दिया है। पैरा बैडमिंटन और पैरा आर्चरी में भी भारतीय खिलाड़ियों ने अपनी क्षमता का प्रभावशाली प्रदर्शन किया है।
इस ऐतिहासिक प्रतियोगिता में मध्यप्रदेश के पैरा जूडो खिलाड़ी कपिल परमार ने भी शानदार प्रदर्शन करते हुए पुरुषों के J1-70 किलोग्राम भार वर्ग में कांस्य पदक जीतकर भारत और मध्यप्रदेश का गौरव बढ़ाया है। कपिल ने प्लेऑफ मुकाबले में इंडोनेशिया के खिलाड़ी को पराजित कर यह उपलब्धि हासिल की है। मध्यप्रदेश में पैरा खेलों को प्रोत्साहित करने, खिलाड़ियों तक आधुनिक सुविधाएँ उपलब्ध कराने और प्रतिभाओं को नए अवसर देने के लिए लगातार प्रयास किया जा रहा है।
एशियन पैरा गेम्स 2026 में 114 पदकों की ऐतिहासिक उपलब्धि इन खिलाड़ियों के अदम्य साहस, दृढ़ संकल्प और असाधारण सामर्थ्य का प्रमाण है। यह सफलता देश में पैरा खेलों को और अधिक प्रोत्साहित करने, प्रतिभाओं को आगे बढ़ाने तथा भारत को वैश्विक खेल जगत में नई ऊँचाइयों तक पहुँचाने की प्रेरणा देती है।

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