उत्तम ‘धमकी’ पर क्षमा याचना करते रहे मुख्यमंत्री

-महेश दीक्षित

भोपाल। यह दृश्य किसी फिल्मी पटकथा जैसा लग सकता है, लेकिन यह हकीकत है। एक ओर मंच पर बैठे महामंडलेश्वर उत्तम स्वामी महाराज के मुख से गुस्से में निकले कठोर शब्द, और दूसरी ओर वर्चुअल स्क्रीन पर नम्र मुद्रा में हाथ जोड़े मध्यप्रदेश के मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव। यह वही क्षण था, जब राजनीति को धर्म के सामने झुकना पड़ा और एक ‘उत्तम धमकी’ ने मुख्यमंत्री को भी क्षमा याचना पर मजबूर कर दिया।

रेहटी (सीहोर) के प्रसिद्ध उत्तम सेवा धाम में आयोजित शरद पूर्णिमा महोत्सव में प्रदेश के कई मंत्री और नेता मौजूद थे। कार्यक्रम के मुख्य अतिथि मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव को होना था, लेकिन वे व्यस्तता के चलते नहीं पहुंच सके। जब मंच से यह स्पष्ट हुआ कि मुख्यमंत्री नहीं आ रहे, तब महामंडलेश्वर उत्तम स्वामी महाराज का धैर्य टूट गया। महाराज ने सख्त स्वर में कहा कि, हमें मंच पर ऐसे लोगों की आवश्यकता नहीं है जो सेवा के प्रकल्प जैसे कार्यक्रम के लिए दो घंटे का समय भी न दे सकें। हम राजनीति से नहीं, भगवान की नीति से चलते हैं। इन शब्दों ने मंच पर उपस्थित मंत्रियों और अधिकारियों को असहज कर दिया और माहौल बदल गया।

मुख्यमंत्री का ‘विनम्र प्रत्युत्तर’

मुख्यमंत्री तक जैसे ही यह संदेश पहुंचा, उन्होंने तत्काल वर्चुअल माध्यम से कार्यक्रम में जुडक़र महाराज से क्षमा याचना की। यह दृश्य अपने आप में अभूतपूर्व था-सत्ता के शिखर पर बैठे व्यक्ति को एक संत के समक्ष क्षमा याचना करते दिखना। डॉ. यादव ने कहा कि वे व्यक्तिगत रूप से आने के इच्छुक थे, लेकिन परिस्थिति वश नहीं आ सके। उन्होंने कई बार हाथ जोडक़र कहा कि, महाराज, मुझे क्षमा करें, अगली बार मैं स्वयं उपस्थित रहूंगा।

क्या हैं इस घटनाक्रम के राजनीतिक मायने

राजनीतिक विज्ञानी इस घटनाक्रम को केवल एक साधारण क्षमा-प्रकरण नहीं मानते, बल्कि यह घटना संदेश देती है कि, मध्यप्रदेश में महामंडलेश्वर उत्तम स्वामी का राजनीतिक प्रभाव बेहद मजबूत है। मुख्यमंत्री द्वारा सार्वजनिक रूप से झुकना यह दर्शाता है कि महामंडलेश्वर उत्तम स्वामी की स्वीकृति आज भी मुख्यमंत्री बने रहने के लिए बेहद आवश्यक है। हालांकि, मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव अपनी धार्मिक छवि और सादगी के लिए जाने जाते हैं। यह क्षमायाचना उस छवि को और पुष्ट करती है कि, वे ‘अहंकार रहित नेता’ हैं, जो संतों के प्रति विनम्रता दिखाने में हिचकिचाते नहीं। इसके अलावा महाराज उत्तम स्वामी का गुस्सा अप्रत्यक्ष रूप से सरकार में बैठे उन लोगों के लिए चेतावनी भी थी, जो उनके सानिध्य में संचालित सेवा संस्थानों और प्रकल्पों की अनदेखी करते रहे हैं।