नई दिल्ली
हाल के दिनों में पाकिस्तान के JF-17 थंडर फाइटर जेट्स की मांग मुस्लिम देशों में तेजी से बढ़ रही है. यह जेट पाकिस्तान और चीन द्वारा मिलकर बनाया गया है। लीबिया के साथ 4 अरब डॉलर का सौदा, सूडान के साथ 1.5 अरब डॉलर का करार और सऊदी अरब के साथ 4 अरब डॉलर की बातचीत चल रही है.
इसके अलावा बांग्लादेश, अजरबैजान और इंडोनेशिया जैसे देश भी इसमें रुचि दिखा रहे हैं. लेकिन सवाल यह है कि इतनी जल्दी क्यों? विशेषज्ञों का मानना है कि अमेरिका का प्रभाव कम हो रहा है और यह उसका असर है.
JF-17 जेट की क्यों हो रही है इसकी बिक्री?
JF-17 थंडर एक मल्टी-रोल फाइटर जेट है, जिसे पाकिस्तान की पाकिस्तान एयरोनॉटिकल कॉम्प्लेक्स (PAC) और चीन की चेंगदू एयरक्राफ्ट इंडस्ट्री ग्रुप ने साथ मिलकर विकसित किया है. यह जेट सस्ता, रखरखाव में आसान और आधुनिक हथियारों से लैस है. पाकिस्तान इसे 'मुस्लिम दुनिया' के आधे हिस्से को बेचने की कोशिश कर रहा है.
लीबिया का सौदा: 4 अरब डॉलर में JF-17 जेट्स खरीदने का समझौता.
सूडान का करार: 1.5 अरब डॉलर का डील.
सऊदी अरब की बातचीत: 4 अरब डॉलर की संभावित डील.
अन्य देशों की रुचि: बांग्लादेश, अजरबैजान और इंडोनेशिया भी JF-17 खरीदने पर विचार कर रहे हैं.
ये सौदे पाकिस्तान की अर्थव्यवस्था के लिए फायदेमंद हैं. चीन की हथियार निर्यात रणनीति को मजबूत करते हैं.
अमेरिका का प्रभाव क्यों कम हो रहा है?
विशेषज्ञों के अनुसार, ये सौदे अमेरिका के घटते प्रभाव को दिखाते हैं. पहले सऊदी अरब और अन्य खाड़ी देश अमेरिकी सुरक्षा प्रणाली पर निर्भर थे. लेकिन अब वे विकल्प तलाश रहे हैं. चीनी जेट्स, पाकिस्तानी उत्पादन लाइन और वैकल्पिक हथियार सप्लाई चेन से अमेरिका के दबाव के पॉइंट कम हो जाते हैं.
अगर अमेरिका सख्त कदम उठाता है, तो ये देश चीन और पाकिस्तान की तरफ और ज्यादा झुक सकते हैं. इसी वजह से अमेरिका संयम बरत रहा है. कूटनीति पर जोर दे रहा है. एक उदाहरण है ट्रंप प्रशासन का ईरान पर हमला न करने का फैसला, जिसमें खाड़ी देशों का दबाव काम आया. यह पूर्व और पश्चिम के बीच क्षेत्रीय प्रभाव की लड़ाई का हिस्सा है.
इंडोनेशिया का मामला: JF-17 की रुचि और ब्रह्मोस सौदा
भारत के लिए सबसे चिंता की बात इंडोनेशिया है. इंडोनेशिया भारत से 450 मिलियन डॉलर का ब्रह्मोस मिसाइल सौदा अंतिम चरण में है, लेकिन साथ ही वह पाकिस्तान से JF-17 जेट्स खरीदने पर विचार कर रहा है.
पिछले हफ्ते इस्लामाबाद में इंडोनेशियाई रक्षा मंत्री सजाफरी सजामसोद्दीन और पाकिस्तानी वायुसेना प्रमुख एयर चीफ मार्शल जहीर अहमद बाबर सिद्दू के बीच बैठक हुई. पाकिस्तान ने 40 JF-17 जेट्स की पेशकश की. इंडोनेशिया पाकिस्तानी कॉम्बैट ड्रोन भी खरीदने पर सोच रहा है.
भारत इंडोनेशिया को दक्षिण चीन सागर में चीन के बढ़ते प्रभाव के खिलाफ महत्वपूर्ण साझेदार मानता है. ऐसे में पाकिस्तान और चीन से जुड़े प्लेटफॉर्म खरीदना भारत के लिए चिंता का विषय है. इससे द्विपक्षीय विश्वास कम हो सकता है. क्षेत्रीय सुरक्षा जटिल हो सकती है.
बांग्लादेश भी पाकिस्तान से JF-17 पर बात कर रहा है, जो क्षेत्र में पाकिस्तान की बढ़ती पहुंच दिखाता है.
ब्रह्मोस मिसाइल क्यों है महत्वपूर्ण?
ब्रह्मोस एक सुपरसोनिक क्रूज मिसाइल है, जिसे भारत और रूस ने मिलकर बनाया है. इसकी रेंज 300 किमी है. स्पीड मैक 3 से ज्यादा. यह रैमजेट इंजन से चलती है. फायर-एंड-फॉरगेट सिस्टम है, मतलब लॉन्च करने के बाद खुद टारगेट को हिट करती है.
पिछले साल मई में भारत-पाकिस्तान तनाव के दौरान ब्रह्मोस ने अहम भूमिका निभाई. ऑपरेशन सिंदूर में भारतीय वायुसेना ने Su-30MKI जेट्स से 15 ब्रह्मोस मिसाइलें दागीं. इनसे पाकिस्तान के 12 में से 11 प्रमुख एयरबेस (जैसे चकलाला, रफिकी, सरगोधा आदि) को नुकसान पहुंचा. रडार, कमांड सेंटर, गोला-बारूद डिपो और रनवे तबाह हो गए. पाकिस्तानी प्रधानमंत्री शहबाज शरीफ ने माना कि हमला अप्रत्याशित था.
यह मिसाइल भारत की आक्रामक रणनीति का गेम-चेंजर है. इंडोनेशिया इसे खरीदकर अपनी समुद्री रक्षा मजबूत करना चाहता है, खासकर नतुना सागर में. फिलीपींस ने 2022 में 375 मिलियन डॉलर में ब्रह्मोस खरीदा और इससे दक्षिण चीन सागर में अपनी स्थिति मजबूत की.
भारत की चिंता और आगे क्या?
भारत के रक्षा विशेषज्ञ मानते हैं कि इंडोनेशिया का JF-17 पर विचार ब्रह्मोस सौदे के बीच में गलत संकेत देता है. इससे साझेदारी पर असर पड़ सकता है. नवंबर 2023 में भारत-इंडोनेशिया रक्षा मंत्रियों की बैठक में ब्रह्मोस पर प्रगति हुई. सौदा लगभग पूरा है, सिर्फ रूस की मंजूरी बाकी है (रूस की ब्रह्मोस में 49.5% हिस्सेदारी है).
इंडोनेशियाई राष्ट्रपति प्रबोवो सुबियांतो 2025 के गणतंत्र दिवस पर भारत आए थे, तब ब्रह्मोस पर चर्चा हुई. इंडोनेशिया को ब्रह्मोस से अपनी सैन्य आधुनिकीकरण में मदद मिलेगी.
लेकिन JF-17 की खरीद भारत को सतर्क कर रही है. क्या इंडोनेशिया ब्रह्मोस सौदे पर पीछे हटेगा? या दोनों सौदे साथ चलेंगे? यह समय बताएगा. कुल मिलाकर, यह वैश्विक हथियार बाजार में बदलते संतुलन को दिखाता है, जहां चीन और पाकिस्तान नए विकल्प दे रहे हैं. अमेरिका का एकाधिकार टूट रहा है.

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