भोपाल
गोवर्धन पूजा हमारी सनातन संस्कृति का ऐसा पावन पर्व है, जो प्रकृति के प्रति कृतज्ञता, गौ-माता के प्रति श्रद्धा और समस्त जीव-जगत के संरक्षण का संदेश देता है। भगवान कृष्ण द्वारा गोवर्धन पर्वत धारण करने की लीला हमें सिखाती है कि प्रकृति, पर्वत, जल, वनस्पति और गौवंश का संरक्षण मानव जीवन के अस्तित्व और समृद्धि के लिए अनिवार्य है। यह पर्व केवल धार्मिक अनुष्ठान नहीं, बल्कि प्रकृति के साथ संतुलित सह-अस्तित्व और समाज के सामूहिक उत्तरदायित्व का प्रतीक है।
भारत की संस्कृति में गौ-माता को विशेष स्थान प्राप्त है। हमारी कृषि व्यवस्था, ग्रामीण अर्थव्यवस्था, पोषण, पर्यावरण और सामाजिक जीवन में गौवंश का महत्वपूर्ण योगदान रहा है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी जी के नेतृत्व में आज देश अपनी इसी समृद्ध परंपरा को आधुनिक विकास की अवधारणा के साथ जोड़कर आगे बढ़ रहा है। प्रधानमंत्री जी का विजन है कि गांव आत्मनिर्भर बनें, किसान समृद्ध हों, प्राकृतिक संसाधनों का संरक्षण हो और अपशिष्ट भी आर्थिक संपदा में परिवर्तित हो। गौ-संवर्धन, प्राकृतिक खेती, जैविक खाद और गोबर से स्वच्छ ऊर्जा का उत्पादन इसी व्यापक दृष्टिकोण के महत्वपूर्ण आयाम हैं।
प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के नेतृत्व में प्रारंभ की गई प्राकृतिक खेती को प्रोत्साहित करने की पहल और गोबर-धन जैसी योजनाएं इस सोच को व्यावहारिक स्वरूप प्रदान कर रही हैं। गोबर-धन के माध्यम से गोबर एवं अन्य जैविक अपशिष्ट से बायोगैस और कम्प्रेस्ड बायोगैस उत्पादन को बढ़ावा दिया जा रहा है। इससे स्वच्छ ऊर्जा के साथ जैविक खाद का उत्पादन, ग्रामीण क्षेत्रों में रोजगार और किसानों के लिए आय के नए अवसर सृजित हो रहे हैं। अगस्त 2026 में केंद्र सरकार द्वारा 23,731 करोड़ रुपये के परिव्यय वाली राष्ट्रीय सर्कुलर बायोएनर्जी योजना को स्वीकृति दिया जाना इस दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम है। यह प्रधानमंत्री जी के वेस्ट-टू-वेल्थ और आत्मनिर्भर भारत के संकल्प को और गति प्रदान करेगा।
मध्यप्रदेश में मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव के नेतृत्व में राज्य सरकार गौ-संरक्षण एवं संवर्धन को जनभागीदारी और आर्थिक स्वावलंबन से जोड़कर आगे बढ़ा रही है। प्रदेश में वर्ष 2024-25 को गौवंश संरक्षण एवं संवर्धन वर्ष के रूप में मनाया गया। गौशालाओं को मिलने वाली सहायता राशि 20 रुपये से बढ़ाकर 40 रुपये प्रति गौवंश प्रतिदिन की गई है। गौवंश के भरण-पोषण के लिए बजट में भी उल्लेखनीय वृद्धि की गई है। पंजीकृत एवं संचालित गौशालाओं को डीबीटी के माध्यम से सीधे अनुदान राशि उपलब्ध कराई जा रही है, जिससे गौवंश के लिए चारा, आहार, देखभाल और आवश्यक व्यवस्थाओं को बेहतर बनाया जा सके।
प्रदेश सरकार का प्रयास है कि गौशालाएं केवल निराश्रित गौवंश को आश्रय देने तक सीमित न रहें, बल्कि वे आत्मनिर्भरता और ग्रामीण रोजगार के केंद्र भी बनें। गोबर से जैविक खाद, वर्मी कम्पोस्ट, गो-काष्ठ, उपले तथा अन्य उपयोगी उत्पाद तैयार करने से गौशालाओं की आय बढ़ सकती है। गोबर और गोमूत्र आधारित प्राकृतिक खेती से खेती की लागत कम करने, मिट्टी की उर्वरता बनाए रखने तथा पर्यावरण के अनुकूल कृषि पद्धतियों को प्रोत्साहित करने के अवसर उपलब्ध होते हैं। इस प्रकार गौ-संवर्धन किसान, पशुपालक, महिला स्व-सहायता समूह और ग्रामीण उद्यमियों के आर्थिक सशक्तीकरण का माध्यम बन सकता है।
विंध्य की धरती पर गौ-संरक्षण और प्राकृतिक खेती के इसी समन्वित दृष्टिकोण का सशक्त उदाहरण बसामन मामा गोवंश वन्य विहार, रीवा है। यह केवल गौवंश के आश्रय का केंद्र नहीं, बल्कि गौ-सेवा, पर्यावरण संरक्षण, जैव विविधता और प्राकृतिक खेती का एक विकसित होता मॉडल है। लगभग एक हजार एकड़ वन क्षेत्र से घिरे इस परिसर में निराश्रित गौवंश के संरक्षण के साथ प्राकृतिक संसाधनों के सदुपयोग की दिशा में कार्य किए जा रहे हैं। यहां गोबर और गोमूत्र से जैविक खाद तथा अन्य उत्पाद तैयार करने की संभावनाओं को विकसित किया जा रहा है। गौवंश आधारित प्राकृतिक खेती का यह प्रयोग छोटे और सीमांत किसानों के लिए विशेष रूप से उपयोगी साबित हो सकता है।
गत 25 दिसंबर 2025 को केंद्रीय गृह एवं सहकारिता मंत्री अमित शाह जी का रीवा स्थित बसामन मामा गोवंश वन्य विहार में आगमन हमारे लिए विशेष गौरव का विषय रहा। केंद्रीय मंत्री शाह जी ने गौवंश वन्य विहार का अवलोकन किया तथा गौ-संरक्षण और प्राकृतिक खेती के प्रयासों की जानकारी प्राप्त की। इस अवसर पर उन्होंने बसामन मामा गोवंश वन्य विहार को प्राकृतिक खेती के माध्यम से छोटे और सीमांत किसानों को समृद्ध बनाने का सफल प्रयोग बताया। उन्होंने कहा कि प्राकृतिक खेती से किसानों की आय बढ़ेगी, पानी का संरक्षण होगा और लोगों को अनेक प्रकार की बीमारियों से बचाने में मदद मिलेगी। उन्होंने पारंपरिक कृषि पद्धतियों को अपनाने और प्रकृति के साथ सामंजस्य स्थापित करने का आह्वान भी किया।
केंद्रीय गृह एवं सहकारिता मंत्री शाह का यह वक्तव्य हमारे लिए मार्गदर्शक है। बसामन मामा में विकसित हो रहा मॉडल यह प्रमाणित करता है कि गौवंश का संरक्षण और किसानों की आर्थिक समृद्धि एक-दूसरे के पूरक हो सकते हैं। इस क्षेत्र को प्राकृतिक एवं जैविक खेती के ऐसे मॉडल के रूप में विकसित करने का प्रयास है, जहां गौशाला से प्राप्त संसाधनों का उपयोग कृषि, उद्यानिकी, जैविक खाद और ग्रामीण उद्यमिता को बढ़ावा देने में किया जा सके।
रीवा में ही हिनौती गौधाम वन्य विहार को आदर्श गौ-अभयारण्य के रूप में विकसित करने की योजना भी इसी सोच का विस्तार है। यहां 15 हजार से अधिक गौवंश को आश्रय देने की परिकल्पना की गई है। प्रारंभिक चरण में तीन हजार गौवंश के लिए व्यवस्थाएं विकसित करने तथा आगे चलकर गौधाम को कौशल प्रशिक्षण, जल संरक्षण, नवीकरणीय ऊर्जा और स्वरोजगार से जोड़ने की योजना है। गोबर गैस संयंत्र और धान के पैरे से ऊर्जा उत्पादन जैसे प्रकल्प भी इस पहल को पर्यावरण संरक्षण एवं ग्रामीण अर्थव्यवस्था से जोड़ते हैं। हिनौती गौधाम भविष्य में गौ-संरक्षण और स्थानीय रोजगार का महत्वपूर्ण केंद्र बन सकता है।
रीवा की ऐतिहासिक लक्ष्मणबाग गौशाला गौ-सेवा और संरक्षण की हमारी परंपरा का महत्वपूर्ण केंद्र है। यहां गौवंश के संरक्षण, उनके भरण-पोषण तथा गौशाला की व्यवस्थाओं को बेहतर बनाने के लिए निरंतर प्रयास किए जा रहे हैं। लक्ष्मणबाग जैसी संस्थाओं का संरक्षण और विकास हमारी सांस्कृतिक विरासत के साथ-साथ सामाजिक सहभागिता को भी मजबूत करता है। मेरा मानना है कि शासन के प्रयासों के साथ समाज, धार्मिक संस्थाओं, स्वयंसेवी संगठनों और आम नागरिकों की सक्रिय भागीदारी से गौ-संरक्षण का अभियान व्यापक जनआंदोलन बन सकता है।
राज्य सरकार का संकल्प है कि मध्यप्रदेश में गौवंश को निराश्रित छोड़ने की समस्या का स्थायी समाधान हो। इसके लिए गौशालाओं की क्षमता बढ़ाने, चारे की उपलब्धता, पशु चिकित्सा सुविधाओं, बेहतर प्रबंधन और आर्थिक आत्मनिर्भरता पर ध्यान दिया जा रहा है। साथ ही गौपालन को किसानों की अतिरिक्त आय का माध्यम बनाने, नस्ल सुधार, दुग्ध उत्पादन और पशुपालन आधारित स्वरोजगार को प्रोत्साहित करने की दिशा में भी प्रयास किए जा रहे हैं। गोवर्धन पूजा हमें यह स्मरण कराती है कि विकास का वास्तविक अर्थ केवल आर्थिक प्रगति नहीं, बल्कि प्रकृति, पर्यावरण और जीव-जंतुओं के प्रति संवेदनशीलता भी है। गौ-माता की सेवा, गौवंश का संरक्षण, प्राकृतिक खेती और जैविक संसाधनों का सदुपयोग हमारे भविष्य को सुरक्षित बनाने के महत्वपूर्ण आधार हैं।
आइए, इस पावन अवसर पर हम सभी गौ-सेवा, गौ-संरक्षण, पर्यावरण सुरक्षा और प्राकृतिक खेती को अपने जीवन का हिस्सा बनाने का संकल्प लें। प्रधानमंत्री मोदी जी के आत्मनिर्भर भारत और विकसित भारत के विजन तथा मुख्यमंत्री डॉ. यादव जी के नेतृत्व में मध्यप्रदेश को गौ-संवर्धन, प्राकृतिक खेती और ग्रामीण आत्मनिर्भरता का अग्रणी केंद्र बनाने के लिए हम सभी मिलकर कार्य करें। गौ-सेवा में संस्कृति का संरक्षण है, प्रकृति के सम्मान में मानवता का कल्याण है और आत्मनिर्भर गांवों में विकसित भारत का भविष्य है।
सभी प्रदेशवासियों को गोवर्धन पूजा की हार्दिक शुभकामनाएं।

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