नई दिल्ली
कैबिनेट बैठक में महिला आरक्षण बिल पर मुहर लग गई। सोमवार को हुए इस घटनाक्रम के साथ ही 27 सालों से अटके विधेयक को पास कराने की पूरी तैयारी हो चुकी है। खास बात है कि बिल को लाने वाली सरकार के साथ-साथ कांग्रेस समेत विपक्ष के भी कई बड़े दल इसके समर्थन में आ गए हैं। इससे पहले 2010 में यह बिल राज्यसभा में पास हो गया था। तब देश में UPA सरकार थी। सवाल एक यह भी है कि क्या एनडीए सरकार का यह बिल UPA सरकार के मसौदे की तुलना में अलग होगा या नहीं? एक मीडिया रिपोर्ट के अनुसार, माना जा रहा है कि मोदी सरकार 2010 में राज्यसभा में पास हुए बिल को वापस ले सकती है और संसद के जारी विशेष सत्र में नया बिल पेश कर सकती है। फिलहाल, अंतिम मसौदा पेश होने तक कुछ भी साफ नहीं है।
संभावनाएं जताई जा रही हैं कि सरकार इस बिल के दायरे में राज्यसभा और विधान परिषदों को भी शामिल कर सकती है। जबकि, UPA ने लोकसभा और विधानसभाओं को ही शामिल किया था। साथ ही यह भी कहा जा रहा है कि नए बिल में महिला आरक्षण के दायरे में ओबीसी समुदाय को भी शामिल किया जा सकता है। तब UPA की तरफ से पेश बिल में कहा गया था कि अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति के लिए आरक्षित सीटों के बाद महिलाओं के लिए आरक्षण होगा। उस दौरान समाजवादी पार्टी और राष्ट्रीय जनता दल जैसे राजनीतिक दलों का कहना था कि आरक्षण में ओबीसी को भी शामिल किया जाना चाहिए। इसे लेकर भी अटकलों का दौर जारी है कि एनडीए सरकार ये बदलाव करेगी या नहीं।
पीएम पहले ही दे चुके हैं संकेत
संसद के विशेष सत्र से पहले प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने बड़े संकेत दे दिए थे। उन्होंने कहा था कि 'ऐतिहासिक फैसले' होने जा रहे हैं। इसके साथ ही पांच दिवसीय सत्र में बड़े बदलाव होने के आसार हैं। वहीं, लोकसभा में संबोधन के दौरान भी उन्होंने महिलाओं के योगदान पर भी बात की। उन्होंने बताया कि करीब 600 महिला सांसद इस भवन का हिस्सा रह चुकी हैं।

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