बड़वानी
जिले के एक पीएम स्कूल में प्रशासनिक प्रक्रियाओं को लेकर गंभीर सवाल खड़े हो रहे हैं। मामला ऐसा है कि जहां जांच भी “खुद” हो रही है और नोटिस भी “खुद” ही जारी किए जा रहे हैं। इस पूरे घटनाक्रम ने पारदर्शिता और निष्पक्षता पर प्रश्नचिह्न लगा दिया है।
सूत्रों के अनुसार स्कूल में कुछ वित्तीय और प्रशासनिक गड़बड़ियों की शिकायत के बाद जांच की गई, जिसमें अनियमितताएं सामने आईं। लेकिन हैरानी की बात यह है कि जांच प्रक्रिया और उसके बाद की कार्रवाई में वही लोग सक्रिय दिख रहे हैं, जिन पर सवाल उठ रहे हैं। ऐसे में निष्पक्ष जांच की उम्मीद कमजोर पड़ती नजर आ रही है।
मामले में यह भी सामने आया है कि करीब 7.79 लाख रुपये के अटैचमेंट और वित्तीय लेन-देन को लेकर भी संदेह जताया जा रहा है। आरोप है कि पहले चेक के माध्यम से भुगतान दिखाया गया, फिर कैश लेन-देन की बात सामने आई और उसके बाद नोटिस जारी किए गए। इस पूरे क्रम ने संदेह को और गहरा कर दिया है।
सबसे बड़ा सवाल यह है कि जब जांच में गड़बड़ियां सामने आ चुकी हैं, तो फिर कार्रवाई का जिम्मा उन्हीं लोगों को क्यों दिया जा रहा है? क्या यह “मॉडल स्कूल” की छवि है या “मॉडल गड़बड़ी” का उदाहरण बनता जा रहा है?
स्थानीय लोगों और अभिभावकों का कहना है कि यदि समय रहते इस मामले में उच्चस्तरीय और निष्पक्ष जांच नहीं कराई गई, तो शिक्षा व्यवस्था की साख पर असर पड़ेगा।
अब निगाहें जिला प्रशासन पर टिकी हैं। सवाल यह भी उठ रहा है कि जब मीडिया में खबरें सामने आ रही हैं और नोटिस जारी हो रहे हैं, तब भी प्रशासन आखिर मौन क्यों है?

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