नई दिल्ली। आंसुओं का निकलना केवल आंखों से पानी गिराना नहीं, बल्कि शरीर और मन के बीच जटिल समन्वय का नतीजा है। आंसू हमारे शरीर की एक प्राकृतिक प्रतिक्रिया हैं, जो खुशी, दुख या दर्द जैसी भावनाओं में बहते हैं। वैज्ञानिकों ने आंसुओं को -बेसल(आंखों की सुरक्षा के लिये), नॉन-इमोशनल (भाव शून्य) और क्राइंग आंसू (भावनात्मक) तीन प्रकारों में बांटा है।
हर प्रकार का आंसू अलग कारण और उद्देश्य से उत्पन्न होता है और हमारी आंखों और मानसिक स्वास्थ्य दोनों के लिए महत्वपूर्ण होता है। बेसल आंसू नॉन-इमोशनल होते हैं और ये आंखों को सूखने से बचाते हैं। इनमें लगभग 98 प्रतिशत पानी होता है और यह आंखों को नरम व साफ बनाए रखते हैं। बेसल आंसू लगातार उत्पन्न होते रहते हैं और आंखों की रक्षा तथा लुब्रिकेशन के लिए जरूरी हैं। नॉन-इमोशनल आंसू किसी विशेष कारण से उत्पन्न होते हैं। उदाहरण के लिए, प्याज काटने पर, धूल या मिट्टी आंखों में जाने पर हमारी आंखें आंसू बहाती हैं। यह एक सुरक्षा तंत्र है जो आंखों को हानिकारक तत्वों से बचाता है और उन्हें साफ करता है। क्राइंग आंसू भावनाओं के कारण उत्पन्न होते हैं। यह दुख, खुशी, दर्द या किसी तीव्र भावना के कारण बहते हैं। क्राइंग आंसू हमारे अंदर की भावनाओं का बाहरी रूप होते हैं और मानसिक स्थिति को व्यक्त करने में मदद करते हैं।
आंसू बहने की इस प्रक्रिया में दिमाग का लिंबिक सिस्टम और हाइपोथैलेमस नर्वस सिस्टम मुख्य भूमिका निभाते हैं। जब भावनाएं चरम पर होती हैं, न्यूरोट्रांसमीटर संकेत भेजते हैं, जिससे आंखों से क्राइंग आंसू बहने लगते हैं। आंसू केवल भावनाओं को व्यक्त नहीं करते। इनमें मेंटल हेल्थ सुधारने की शक्ति भी होती है। बेसल और नॉन-इमोशनल आंसू आंखों को सुरक्षित रखते हैं। जबकि क्राइंग आंसू तनाव को कम करके मानसिक स्थिति को बेहतर बनाते हैं। इसलिए, रोना केवल कमजोरी नहीं, बल्कि शरीर और मन के बीच संतुलन बनाए रखने का एक प्राकृतिक तरीका है।

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