February 15, 2026

सुप्रीम कोर्ट बार एसोसिएशन ने मौजूदा कोलेजियम प्रणाली की खामियों पर उठाए कई सवाल

नई दिल्ली। भारत की न्यायपालिका में नियुक्तियों को लेकर एक बार फिर विवाद खड़ा हो गया है। सुप्रीम कोर्ट बार एसोसिएशन (एससीबीए) ने भारत के चीफ जस्टिस भूषण रामकृष्ण गवई को पत्र लिखकर न्यायाधीशों की नियुक्ति प्रक्रिया में पारदर्शिता, योग्यता और जवाबदेही तय करने की मांग की है। एससीबीए ने मौजूदा कोलेजियम प्रणाली की कई खामियों की ओर इशारा किया है।

एससीबीए अध्यक्ष विकास सिंह ने पत्र में लिखा है कि यह प्रणाली, जो शुरू में न्यायपालिका की स्वतंत्रता तय करने के लिए बनाई गई थी, अब अपने ही बोझ तले दब गई है। आरोप है कि सुप्रीम कोर्ट बार के प्रतिभाशाली वकीलों को जानबूझकर उनके गृह राज्य के हाईकोर्ट में न्यायाधीश बनने से वंचित किया जा रहा है। जबकि वे राष्ट्रीय कानून व्यवस्था और न्यायिक दृष्टिकोण में काफी अनुभव रखते हैं। यह सीधे-सीधे मेधा आधारित चयन प्रणाली के मूल सिद्धांत के खिलाफ है।

एससीबीए ने यह भी आरोप लगाया कि न्यायपालिका में महिलाओं और विविध पृष्ठभूमि से आने वाले व्यक्तियों का प्रतिनिधित्व बेहद कम है। फरवरी 2024 तक हाईकोर्टों में मात्र 9.5 फीसदी और सुप्रीम कोर्ट में केवल 2.94 फीसदी महिला न्यायाधीश ही हैं। पत्र में लिखा है कि यह आंकड़े न्यायिक नियुक्तियों में न केवल असंतुलन दिखाते हैं, बल्कि यह भी सिद्ध करते हैं कि अब तक नियुक्तियों का आधार निष्पक्षता के बजाय अनौपचारिक नेटवर्क और सिफारिशों पर आधारित रहा है।

पत्र में उल्लेख किया गया है कि कोर्ट की सफलता के पीछे अक्सर ब्रीफिंग वकीलों और जूनियरों का बड़ा योगदान है, लेकिन न्यायिक पदों की नियुक्ति में केवल बहस करने वाले वरिष्ठ वकीलों को ही प्राथमिकता दी जाती है। यह प्रक्रिया न्यायिक क्षमता के असली पैमाने को नकारती है। एससीबीए ने एमओपी को प्रभावी और पारदर्शी बनाने के लिए कई अहम सुझाव भी दिए हैं। उम्मीदवारों और रिक्तियों से संबंधित आंकड़ों को संरक्षित करने और संस्थागत स्मृति को बनाए रखने के लिए प्रत्येक उच्च न्यायालय और सर्वोच्च न्यायालय में एक स्थायी सचिवालय स्थापित करने की बात कही है।

सुझाव में कहा गया है कि न्यायाधीशों की नियुक्ति के लिए एक पारदर्शी, आवेदन-आधारित प्रक्रिया लागू की जाए, जिससे यह तय हो सके कि हरेक योग्य उम्मीदवार को अवसर मिले। उम्मीदवारों के मूल्यांकन के लिए वस्तुनिष्ठ मानदंड प्रकाशित करने की बात कही गई है, जैसे आयु, कानूनी अनुभव, प्रकाशित निर्णय और नि:शुल्क कार्य। एससीबीए ने यह भी कहा कि कुछ समय पहले न्यायाधीशों की नियुक्ति सुविधा अधिनियम नाम से एक प्रस्तावित कानून का मसौदा बनाकर सरकार को सौंपा गया था, जिसे अब फिर से विचार में लिया जाना चाहिए। पत्र के आखिर में एससीबीए अध्यक्ष विकास सिंह ने लिखा- न्यायिक नियुक्तियों में पारदर्शिता और योग्यता का पुनर्स्थापन ही जनता के विश्वास को लौटाने का एकमात्र रास्ता है। उन्होंने आग्रह किया कि कोलेजियम और सरकार मिलकर एमओपी को अंतिम रूप दें और सुधारों की प्रक्रिया को अब और टालने की कोई गुंजाइश नहीं है।