काठमांडू। नेपाल में केपी ओली सरकार के तख्तापलट के साथ भडक़ी हिंसा हुई पूरी दुनिया को चौंका रही है। इस हिंसा के पीछे तमाम राजनैतिक कारणों के अलावा भ्रष्टाचार, परिवारवाद, अमीर-गरीब की बढ़ती खाई और बेरोजगारी को माना जा रहा है। यहां आम आदमी को पर्याप्त शिक्षा और स्वास्थ्य जैसी बुनियादी सुविधाएं मिल रही हैं। बेरोजगारों की फौज बढ़ती जा रही है। ऐसे हालातों के बीच नेताओं, उनके बच्चों और उनके सगे-संबंधियों के ऐशोआराम और मौज मस्ती की जिंदगी आम जनता को लंबे समय से खलती रही है।
नेपाल की राजनीति में परिवारवाद राजधानी काठमांडू से लेकर गांव-कस्बों तक फैला हुआ है। नेपाली कांग्रेस में देउबा परिवार के कई सदस्य राजनीति में हैं। केपी ओली की रिश्तेदार अंजन शक्य को नेशनल असेंबली सदस्य बनाने की सिफारिश की गई और राष्ट्रपति ने उनकी नियुक्ति भी कर दी। ऑस्ट्रेलिया, कतर, बांग्लादेश और स्पेन के लिए नेपाल के राजदूत के चुनाव पर गंभीर सवाल उठे। आरोप हैं कि इनमें से कई नेताओं के रिश्तेदार या नजदीकी थे, जबकि योग्य लोगों की अनदेखी कर दी गई। महेश दहाल को ऑस्ट्रेलिया का राजदूत बनाया गया, जो माओवादी नेता प्रचंड (पुष्प कमल दहाल) के करीबी रिश्तेदार बताए जाते हैं। नारद भारद्वाज को कतर भेजा गया। वह केपी शर्मा ओली के भरोसेमंद बताए जाते हैं।
सोशल मीडिया पर युवाओं ने नेताओं के बच्चों की ऐशो-आराम वाली जिंदगी की तस्वीरें और वीडियो शेयर किए। संसद परिसर तक पहुंचे युवाओं ने नारे लगाए कि हमारा टैक्स, तुम्हारी रईसी नहीं चलेगी। ये सिर्फ गुस्से-गुबार का इजहार नहीं है, बल्कि एक डिजिटल विद्रोह है जो अब सडक़ों पर दिखाई दे रहा है। सोशल मीडिया बैन ने बस उस आग में घी डालने का काम किया, जिसके पीछे लंबे समय से जमा हताशा और आक्रोश पल रहा था।

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