बिलाषपुर
आर्थिक रूप से कमजोर वर्ग के बच्चों को शिक्षा के अधिकार के तहत नि:शुल्क शिक्षा देने के मामले में प्रस्तुत जनहित याचिका को हाईकोर्ट ने स्वीकार कर लिया है।
चीफ जस्टिस की बेंच ने राज्य शासन को इस बारे में संविधान के अनुच्छेद 21 ए के तहत एक नई नीति बनाने का निर्देश दिया है। कोर्ट ने 6 माह के भीतर इसकी कार्रवाई पूरी करने को कहा है। सीवी भगवंत राव ने 6 से 14 वर्ष की आयु के उन बच्चों को निजी स्कूलों में भी नि:शुल्क शिक्षा उपलब्ध कराने की मांग रखी जो आर्थिक रूप से कमजोर वर्ग में आते हैं।
शिक्षा के अधिकार के तहत यह मांग रखते हुए हाईकोर्ट में जनहित याचिका दायर की गई थी। मामले में चीफ जस्टिस रमेश सिन्हा और जस्टिस रविन्द्र अग्रवाल की डीबी ने पिछली बार अपना आदेश सुरक्षित रख लिया था। आज इसे जारी करते हुए कोर्ट ने सरकार को इस विषय पर 6 माह में नई नीति बनाने का निर्देश दिया।
आर्थिक रूप से कमजोर बच्चों के लिए तैयार करें नीति
कोर्ट ने कहा कि पक्षकारों के अधिवक्ताओं द्वारा प्रस्तुत किए गए तर्कों, इस जनहित याचिका के माध्यम से याचिकाकर्ता द्वारा उठाई गई शिकायत, जनहित याचिका के साथ संलग्न दस्तावेजों और प्रतिवादियों द्वारा दाखिल रिटर्न तथा सर्वोच्च न्यायालय द्वारा उपर्युक्त निर्णय में निर्धारित कानून तथा आरटीई अधिनियम में निहित प्रावधानों तथा विश्लेषण से मालूम हुआ कि राज्य सरकार द्वारा उपरोक्त विषय पर कोई स्पष्ट रोडमैप नहीं बनाया गया है।
इसलिए प्रतिवादी-राज्य को यह निर्देश दिया जाता है कि वह ‘आर्थिक रूप से कमजोर वर्ग’ के बच्चों को मुत और अनिवार्य शिक्षा के अधिकार के संबंध में नीति तैयार करे। ताकि भारत के संविधान के अनुच्छेद 21 ए में निहित आरटीई अधिनियम की भावना और उद्देश्य को कानून के अनुसार यथाशीघ्र पूरा किया जा सके।

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