नई दिल्ली
देश के जाने-माने संविधान विशेषज्ञ और पूर्व लोकसभा महासचिव डॉ. सुभाष सी. कश्यप का निधन हो गया है। अपने निवास स्थान पर उन्होंने 97 साल की उम्र में अंतिम सांस ली। जानकारी के अनुसार डॉ. सुभाष कश्यप का निधन कार्डियो-पल्मोनरी अरेस्ट (हृदय और फेफड़ों की गति रुक जाने) के कारण हुआ है।
नेहरू के दौर से नौवीं लोकसभा तक
डॉ. सुभाष सी. कश्यप का संसदीय करियर अपने आप में एक जीवंत इतिहास रहा है। उन्होंने देश के प्रथम प्रधानमंत्री पंडित जवाहरलाल नेहरू के कार्यकाल वाली पहली लोकसभा से लेकर नौवीं लोकसभा तक, कुल 37 वर्षों से भी अधिक समय तक भारतीय संसद की अनवरत और निष्पक्ष सेवा की। इस सुदीर्घ सेवाकाल के दौरान उन्होंने न केवल विधायी प्रक्रियाओं का संचालन किया, बल्कि देश के कई ऐतिहासिक फैसलों और कानून निर्माण की प्रक्रियाओं के वे प्रत्यक्ष गवाह भी रहे। उनके इस अद्वितीय अनुभव और ज्ञान के कारण देश के शीर्ष राजनेता और कानूनविद समय-समय पर संवैधानिक संकटों के समाधान के लिए उनका मार्गदर्शन प्राप्त करते थे।
क्रांतिकारी छात्र जीवन और स्वतंत्रता आंदोलन में सक्रिय भागीदारी
डॉ. कश्यप का जन्म वर्ष 1929 में तत्कालीन संयुक्त प्रांत (जो वर्तमान समय में उत्तर प्रदेश के नाम से जाना जाता है) के बिजनौर जिले के चांदपुर नामक स्थान पर एक प्रतिष्ठित स्वतंत्रता सेनानी परिवार में हुआ था। देशभक्ति के माहौल में पले-बढ़े होने के कारण उनके भीतर बचपन से ही राष्ट्र सेवा का जज्बा कूट-कूट कर भरा था। यही वजह रही कि उन्होंने अपनी किशोरावस्था में ही भारत के स्वतंत्रता आंदोलन में सक्रिय रूप से भाग लेना शुरू कर दिया था। अपने छात्र जीवन के दौरान उन्होंने ब्रिटिश हुकूमत के खिलाफ पहले बिजनौर और बाद में मेरठ में कई बड़े और ऐतिहासिक छात्र आंदोलनों का अत्यंत कुशलतापूर्वक नेतृत्व किया था।
कालजयी कृतियों के रचनाकार
एक प्रशासनिक अधिकारी और स्वतंत्रता सेनानी होने के साथ-साथ डॉ. सुभाष सी. कश्यप एक अत्यंत प्रखर लेखक, विचारक और शिक्षक भी थे। उन्होंने संविधान, संसद और राजनीतिक व्यवस्था के विभिन्न पहलुओं पर शोध करते हुए 100 से अधिक प्रामाणिक पुस्तकों की रचना की। उनकी लिखी पुस्तकें आज भी देश-विदेश के विश्वविद्यालयों में राजनीति विज्ञान और कानून के विद्यार्थियों के लिए संदर्भ ग्रंथ का काम करती हैं। उनकी सबसे प्रसिद्ध और कालजयी कृतियों में ‘आवर पार्लियामेंट’ (हमारी संसद) और ‘आवर कॉन्स्टिट्यूशन’ (हमारा संविधान) जैसी पुस्तकें शामिल हैं, जिन्होंने आम नागरिकों तक भी देश की जटिल संवैधानिक व्यवस्था को बेहद सरल भाषा में पहुंचाने का अद्भुत कार्य किया।
पद्म भूषण से सम्मानित और राष्ट्र के प्रति उनका अमर योगदान
भारतीय संविधान, विधायी प्रक्रियाओं और संसदीय लोकतंत्र के विकास में दिए गए उनके असाधारण, अतुलनीय और जीवनपर्यंत योगदान को देखते हुए भारत सरकार ने उन्हें देश के प्रतिष्ठित नागरिक सम्मान ‘पद्म भूषण’ से नवाजा था। डॉ. कश्यप का पूरा जीवन देश के लोकतांत्रिक मूल्यों को सहेजने और उन्हें मजबूत करने के प्रति समर्पित रहा। उनका निधन देश के बौद्धिक जगत के लिए एक अपूरणीय क्षति है। वे भले ही आज हमारे बीच भौतिक रूप से मौजूद नहीं हैं, लेकिन उनकी लिखी पुस्तकें, उनके विचार और संसदीय प्रक्रियाओं में किए गए उनके सुधार हमेशा भारतीय लोकतंत्र और आने वाली पीढ़ियों का मार्गदर्शन करते रहेंगे।

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